Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 167
30 verse-groups
- Verse 1एक सौ पैंसठवाँ सर्गं समाप्त एक सौ छासठवाँ सर्ग आत्मख्याति की विशेषता, अन्य ख्यातियों की स…
- Verse 2आत्मा ही, ख्याति यों दो पदो का समानाधिकरणता से अन्वय करनेपर आत्मा कौन है वह ख्याति किविषय…
- Verse 3आत्मशब्द के व्याख्यानभूत चिद्व्योम शब्द में व्योग शब्द का अर्थ प्रपवशून्यता ही है, इसलिए…
- Verse 4विद्वान लोग ख्याति शब्द और उसके अर्थ के बिना स्वप्रकाश आत्मा को शब्द से रहित समग्र रूप से…
- Verse 5इस प्रकार सृष्टि के चिन्मात्ररूप होनेपर विभिन्न वादियो को अभिमत अख्याति आदि शब्दों की असं…
- Verse 6भावार्थक क्तिन्! प्रत्ययान्त अख्याति पद की योजना उसमें क्यो नहीं की जा सकती ? इस प्रश्न…
- Verses 7–8यदि वादी लोग स्वप्न मनोरथ आदि के अन्य दृश्यों की तरह कल्पना मात्ररूप अख्याति आदि को चित्…
- Verse 9ऐसी परिस्थिति में आपकी अभिमत वे अख्याति आदि मेरी आत्मख्याति की विभूतियाँ ही है, ऐसा कहते…
- Verse 10पूर्व वर्णित आत्मख्याति का उपसंहार करते हए पहले जो ˆशिलाजठरर्निधनाम्” -शिला के अन्दर के…
- Verse 11इस विषय में कर्णविभूषण यह महान् आख्यान आप सुनिये | यह आख्यान द्वैतदृष्टियों को नष्ट करने…
- Verse 12चारों ओर नीला आकाश ही यदि दीवार या चट्टान बने उसके समान कठिन निर्मल और विशाल एक शिला है,…
- Verse 13उस शिला में कहींपर भी सन्धियों का जोड नहीं हे, वह अत्यन्त निबिड (ठोस), वज्र के समान मजबूत…
- Verse 14असंख्य कल्पो तक उसका नाश होनेवाला नहीं है, वह अत्यन्त निबिड अंगवाली है, सुन्दरता में भी व…
- Verses 15–18उसकी सजातीय अन्य कोई वस्तु प्रसिद्ध नहीं हे, अतः उसकी विशिष्ट यानी विजातीय से व्यावृत्त ज…
- Verse 19श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, वह शिला है, शिला अचेतन होती है यह सारा संसार जानता है ।…
- Verse 20“जातिस्तु ज्ञायते तस्या विशिष्टा नैव केनचित्“ इस उक्ति से ही इस प्रश्न का उत्तर हो चुका…
- Verse 21श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, यदि उसमें कोई दूसरा नहीं है तो आपने जिन आकाश, वायु आदि क…
- Verses 22–25श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, वह अत्यन्त दृढ शिला तोडी नहीं जा सकती ओर न कोई तोडन…
- Verse 26श्रीरामजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, वर्ह पर उन रेखाओं को किसने देखा है, वे किस तरह की है ओर…
- Verse 27श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, उसके अन्दर उस तरह की वे रेखाएँ मेने देखी हैँ ।…
- Verse 28श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, उस तरह की वज से भी मजबूत वह शिला तोडी नहीं जा सक…
- Verses 29–30श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, मे भी (वसिष्ठशरीर भी) इसके गर्भ में स्थित रेखार…
- Verse 31अव तत्वतः उस शिला को ओर वसिष्ठजी को जानने की इच्छा से श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं। श्रीरामच…
- Verses 32–33श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, इस शिलाख्यानवाचोयुक्ति (वचनभंगी) से मैंने आपसे परमात्म महासत्…
- Verse 34सारा जगत् उस शिला का अगि ही है, यह विस्तार से कहते है । हे रामचन्द्रजी, आकाश को आप उस शि…
- Verse 35उक्त को ही स्पष्टरूप से कहते हैं। भूमि, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार ये सब उस…
- Verse 36ये सब हम लोग भी उस परमात्ममहासत्तारूप शिला के मांस की तरह स्वरूपभूत ही हे । उक्त परमात्मम…
- Verse 37जो यह चिन्मात्रैकस्वरूप अतिमहती शिला है यदि उससे पृथक् कोई है तो वह कहाँ पर है ओर वह कौन…
- Verse 38यदि कोई कहे पृथिवी, घडा, गङ्ख, वस्त्र आदि ही उससे पृथक्रूप से प्रसिद्ध हैं, तो इसपर “नही…
- Verses 39–46तत्त्वज्ञ लोग घट, पट आदि सकल भूत-भौतिक पदार्थो को सर्वतः व्याप्त परमार्थघन एकरस शान्त चिन…