Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 29,30
संस्कृत श्लोक
तदिदं भाति निर्भित्ति तत्स्वभानं यदात्मना ।
भानोर्नभसि भारूपमेव भूतविवर्जितम् ॥ २९ ॥
सद्रूपो यदि बाह्योऽर्थो विद्यते तत्तदुत्थिता ।
स्मृतिः कारणतामेतु नामाद्यजगतः स्थितेः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, मे भी (वसिष्ठशरीर भी) इसके गर्भ में स्थित रेखारूप ही
हूँ, इस कारण वहाँपर स्थित मैं सब रेखाओं को पूर्णतया देखता हू । उसके अन्दर स्थित हुए मैंने अन्दर
स्थित सब रेखाओं को देखा, नहीं तो उस शिला को तोडने-फोडने की किसमें सामर्थ्यहे २