Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
यथास्तीदं महाकारं न किंचिदूपमेव वा ।
तत्त्वज्ञविषयं राम तथास्तीदमखण्डितम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
सारा जगत् उस शिला का अगि ही है, यह विस्तार से कहते है ।
हे रामचन्द्रजी, आकाश को आप उस शिला का अंग जानिये । वायु आदि पाँच महाभूत उसके अंग
हैं, यह समझिये, क्रिया, शब्द आदि यानी वायु, आकाश आदि सब भूत-भौतिकों के धर्म, वासना
आदि मनके धर्म ओर पक्ष, मास, वर्ष आदि काल की कल्पनाएँ उस शिला के अंग हैं