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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । आत्मख्यातिरसत्ख्यातिः ख्यातिरख्यातिरन्यथा । शब्दार्थदृष्टयस्तज्ज्ञं प्रत्येताः शशश्रृङ्गवत् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ पैंसठवाँ सर्गं समाप्त एक सौ छासठवाँ सर्ग आत्मख्याति की विशेषता, अन्य ख्यातियों की स्थिति तथा प्रश्नोत्तरयुक्त ब्रह्मनीलशिला के आख्यान का वर्णन | “विति की यह जगन्नामधारिणी चमत्कृति खूब स्फुरित होती है” ऐसा जो पहले कहा है, उसके विषय में विभिन्न वादियो द्वारा स्वीकृत अख्याति, असत्‌ ख्याति, अन्यथाख्याति, आत्मख्याति नामकी चार ख्यातियों में से किस ख्याति से वह विद्वानों को स्फुरित होती है ऐसी रामचन्द्रजी की जिज्ञासा को चेष्टा द्वारा ताड़कर विद्वानों की दृष्टि से तो विभिन्‍नवादियों द्वारा स्वीकृत चार प्रकार की ख्यातियाँ खरगोश के सींग की तरह ही असत्‌ हैँ अतः आगे उनका खण्डन करनेवाले श्रीवसिष्ठजी विद्रत्संमत पॉचवीं अलौकिक आत्मख्याति को समझाने के लिए उपक्रम करते है । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, वाच्यार्थ सहित “आत्म' शब्द से ओर ख्याति" शब्द से रहित यानी अखण्डार्थवाले आत्मा और ख्यातिरूप दो पदों की लक्ष्यार्थरूप इस आत्मख्याति को आप आगे कही जानेवाली शिला के मध्य के समान घन (ठोस) जानिये