Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
अथवा सर्वमेवेदं जाग्रद्रूपं सदैव च ।
सर्वदैव च वा स्वप्नः सुषुप्तं सर्वदैव च ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, वह शिला है, शिला अचेतन होती है यह सारा संसार जानता है ।
फिर उसको चेतनता कहाँ से प्राप्त हुई ? यह मुझे बतलाने की कृपा कीजिये । यदि वह अचेतन ही है तो
उसने आकाश, वायु आदि नाम कैसे रक्खे ? नाम रखना तो किसी चेतना का ही काम हे