Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verses 7–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 7, 8
संस्कृत श्लोक
नानाविधारम्भमपि महाशून्यमनङ्कितम् ।
पञ्चभूतात्मकमपि खमिवालब्धपञ्चकम् ॥ ७ ॥
पदार्थसंकुलमपि शून्यं संवित्तिमात्रकम् ।
स्वप्ने महापुरमिव दृष्टमप्यच्छचिन्मयम् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि वादी लोग स्वप्न मनोरथ आदि के अन्य दृश्यों की तरह कल्पना मात्ररूप अख्याति आदि को
चित्-वमत्काररूप ही मानें तो वैसा मानें इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है, ऐसा कहते है ।
उस अवस्था में अख्याति, अन्यथाख्याति, असत्ख्यातिरूप दृश्य चिन्मात्ररूप सूर्य की चित्
चमत्कारभूत प्रभाएँ ही हैं जैसे जैसे जब जो जो चिन्मात्रआकाशरूप सूर्य से निर्मल चिद्रूप किरणें अग्नि
से चिनगारियों के समान स्फुरित होती हैं तब वैसी वैसी वे बन जाती हैं