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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verses 15–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, verses 15–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 15-18

संस्कृत श्लोक

यदा यदावभात्यन्तर्येन तेन यथा तथा । सर्वदा न कदाचिद्वा यत्र तत्र न किंचन ॥ १५ ॥ तस्यैव ब्रह्मभानस्य तेनैवं ब्रह्मणात्मना । स्वच्छस्यैव स्वभावस्य स्वस्वभावमनुज्झता ॥ १६ ॥ इदं जाग्रदयं स्वप्नः सुषुप्तं तुर्यमित्यपि । कृतं नाम स्वयं चित्वाद्ब्रह्म वात्मेति चात्मनि ॥ १७ ॥ वस्तुतस्त्वस्ति न स्वप्नो न जाग्रन्न सुषुप्तता । न तुर्यं न ततोऽतीतं सर्वं शान्तं परं नभः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी सजातीय अन्य कोई वस्तु प्रसिद्ध नहीं हे, अतः उसकी विशिष्ट यानी विजातीय से व्यावृत्त जाति को कोई भी नहीं जानता | उसके देश, काल, प्रकार को यानी वह कैसी है, किस देश में हे ओर किस कालमें यह भी कभी किसी ने नहीं जाना । वह शिला अत्यन्त घनी, असीम, कठोर, वजर के समान दृढ और अविनाशिनी है । भूतों यानी महाभूतो ओर चतुर्विध जीवों से विरहित उसके उदर के अन्दर उसकी स्वरूपभूत रेखारूप बहुतसी कमलराशिर्यो शंख, गदाएँ, चक्र आदि वैसे ही विद्यमान हैं जैसे कि स्फटिक शिला के अन्दर स्वरूपभूत बहुतसी रेखाएँ रहती हैं | वहाँ (शिला के अन्दर) आकाश, वायु, जल, तेज आदि जगत्‌ था ही नहीं, किन्तु पूर्वोक्त प्रकार से दुष्टिगत हो रहीं अपनी रेखाओं की ही उसने आकाश, वायु, जल, तेज, पृथिवी आदि संज्ञां रख लीं