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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, Verses 32–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 167, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 167 · श्लोक 32,33

संस्कृत श्लोक

शशश्रृङ्गं यथा नास्ति यथा नास्ति खपादपः । यथा वन्ध्यासुतो नास्ति यथा नास्त्यसितः शशी ॥ ३२ ॥ तथाऽज्ञप्रतिभातोऽर्थो जगदाद्यहमादिकः । अप्रेक्षितोऽस्ति नास्त्येव प्रेक्षितः सन्न कश्चन ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, इस शिलाख्यानवाचोयुक्ति (वचनभंगी) से मैंने आपसे परमात्म महासत्ता का वर्णन किया हे । यह विशाल शिला नहीं हे । उस परमात्ममहासत्तारूप शिला के छिद्ररहित गर्भ में ये हम लोग उस शिला के मांस जैसे ही (स्वरूपभूत ही) स्थित हैं