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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 161

एक सौ उनसठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ साठवाँ सर्ग सायंकाल के समय सभा का उठना तथा दूसरे दिन प्रातःकाल फिर पहले की नाईं लगना एवं भास की जीवन्मुक्तता और अविद्या का वर्णन ।

15 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : हे वत्स, जब विपश्चित्‌ यह कह रहा था तब सुने गये विपश्चित्‌ के वृत…
  2. Verse 2सायंकाल की सूचना देनेवाली दुन्दुभिध्वनि सन्तुष्ट हुई दसों दिशाओं से की गई जयजयकार ध्वनि क…
  3. Verse 3महाराज दशरथ विपश्चित्‌ के लिए राज्य के अनुरूप क्रमश: घर, गृहस्थी, धन आदि का समर्थन करते ह…
  4. Verse 4महाराज दशरथ, श्रीरामन्द्रजी, महामुनि श्रीवसिष्ठजी आदि गणमान्य पुरुष आपस में एक दूसरे को क…
  5. Verses 5–8स्नान और सायंसन्ध्या से निवृत्त होकर, भोजनकर ओर रात्रि में विश्राम कर प्रातःकाल में वे फि…
  6. Verses 9–33हे महामते, भास नामधारी इस विपश्चित्‌ का इतिहास आपने स्वयं ही देखा हे ओर इसके उन मन्त्रियो…
  7. Verse 34यद्यपि इस समय यह जगत्‌ भूतमय (भौतिक) है, ऐसा कहा जा सकता है तथापि सृष्टि के आदिकाल में सद…
  8. Verse 35यदि जगत्‌ अत्यन्त असत्‌ है तो उसका भान कैसे होता है ? इस प्रश्नपर कहते है । जैसे जैसे अनन…
  9. Verses 36–37तब हम लोगों के संकल्प आदि मोघ (निष्फल) क्यो हैं ? ऐसा कोई प्रश्न करे तो तीव्रवेग न होने क…
  10. Verse 38जो पुरुष पूर्वसिद्ध ओर उपासना से कल्पित-दोनो प्रपंचो का दृढ़ संकल्प से "यह अवश्य है” इस ब…
  11. Verse 39सिद्धलोक में उक्त न्याय नरक आदि पाप-फलों की कल्पनाओं में भी तुल्य है, ऐसा कहते हैं। जैसे…
  12. Verse 40संकल्प की अनुसारिता सर्वत्र समान है, ऐसा कहते है । जिस किसी का जैसे संकल्प किया जाता है उ…
  13. Verses 41–43इसलिए मन के अनुसार ही एक शरीर का त्याग कर जीव शीघ्र दूसरे शरीर का ग्रहण करता है, ऐसा कहते…
  14. Verses 44–55निरन्तर घूम रहे गेहूँ आदि पीसने के दो चक्कं से पीसा जाना देखता है ओर जिससे कदापि पुनः उद्…
  15. Verse 56जिस किसी भी चेतन देह आदि का कभी चित्ताकाश में भान हुआ अथवा (भावी का (भविष्य में होनेवाले…