Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verses 44–55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, verses 44–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 44-55
संस्कृत श्लोक
तद्ब्रह्म खं विदुर्द्वैतमद्वैताद्वैतमेव च ।
सर्ग एव परं ब्रह्म द्वैतमद्वैतमेव सत् ॥ ४४ ॥
नेति नेति विनिर्णीय सर्वतोऽभिभवत्यपि ।
पश्चात्त्यक्त्वा चिदाकाशे शिलां कृत्वास्यतामिह ॥ ४५ ॥
यथाक्रमं सुभग यथास्थितस्थिति यथोदयं व्रज पिब भुंक्ष्व भोजय ।
अभीप्सितं गतमननो निरिङ्गनः सुचिन्मये परमपदोपलो भवान् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
निरन्तर घूम रहे गेहूँ आदि पीसने के दो चक्कं से पीसा जाना देखता है ओर जिससे कदापि पुनः
उद्धार न हो ऐसे अन्धकूप में गिरना देखता हे । भयानक शीत से शरीर को जमकर पत्थर बना हुआ
देखता हे तथा भूतो (पिशाचो) और अंगारों से पटे हुए असीम निर्जल (रेगिस्तानी) मार्ग में चल रहे
पथिक के रूप में अपने ओर दूसरों के शरीरो को देखता है । राखरहित अंगारमय मेघो से बरस रहे
अँगारों की वह वृष्टि देखता है जो तपाये हुए बाणो की राशि की तरह तीक्ष्ण और वेगयुक्त होने से
अतिभीषण होती है । जिसमें पत्थर, चक्र ओर तलवारों की नदियाँ बहती हैं ऐसे आकाश मेँ अपना
संचार देखता हे ओर छातियोपर गिराये गये बादल से काले कुल्हाडों के आघात से छातियों को फोड़ना
देखता हे । तपाकर लाल किये हुए लोहे की मूर्ति और त्रिशूल का आलिंगन करना ओर छप्-छप् शब्दके
साथ डूबना देखता है तथा बड़े भारी कट-कट शब्द के साथ शस्त्रयन्त्र में खूब जोर से दबाना देखता
है। चक्र, वज्र, गदा, भाले, बललम, तलवार ओर बाणों की वृष्टि देखता है, काँटेदार शाल्मली से
(सेमर के पेड़ से) आलिंगन, पाश में बाँधघना और खराब-खराब सैकड़ों शक्तियों से छेदना देखता है।
जलती हुई बालू की राशियों में गिरना, पाताल में डूबना, दीये के रूप में प्रच्छन्न (छिपी हुई) लाठी से
भय तथा बड़े-बड़े कौओं के द्वारा नोचना देखता हे । बाहर निकलने के मार्ग से रहित बड़े-बड़े अँगारों
से भरे हुए बड़े भारी घर में घुसना तथा बाण, शक्ति, गदा, भाले, बन्दूक और तलवार से बेंधना देखता
है। मारे भूख से झूँझलाये हुए अतः क्रूर हुए प्रेत-पिशाचों द्वारा आपस में अंगो का चबाना तथा ताल से
भी अधिक ऊँचे स्थान से कठिन शिलातलोंपर पटकना देखता है। रुधिर के घृणित कीचड़ से अंकित
पीव आदि की नदियों की भीड़-भाड़ देखता है और शिलाओंपर शस्त्ररूपी घोड़े और हाथियों के पैरों
तथा पत्थरों द्वारा पीसना देखता है। गड्ढ़े के सदृश प्रदेशों में उललूओं द्वारा देह का नोचना देखता है,
जनसमूह द्वारा मुसलों से पीटना देखता है। और सिर, हाथ, पैर आदि के टुकड़े-टुकड़े करने के लिए
उत्सुक गीधों को देखता है। इस कुकर्म से यह फल होता है, इस प्रकार की भावना से (शास्त्रीय निर्णय
से) जो पहले बहुत बार इस प्रकार के देशों में अनुभव द्वारा दृढ़ हो चुकी, स्वात्मा ही तत्-तत् नरकरूप
से विस्तृत होकर अपनी भावना से मिलता जुलता नारकीय दृश्य इस प्रकार देखता है