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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verse 35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

तन्मैवं क्रियतामेतदबन्धस्यैव बन्धनम् । कान्यता अमलव्योम्नश्चिन्मयस्य निराकृतेः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि जगत्‌ अत्यन्त असत्‌ है तो उसका भान कैसे होता है ? इस प्रश्नपर कहते है । जैसे जैसे अनन्त जगतो का संकल्प किया जाता हे वैसे वैसे चिति में उनका भान होता है । कहिये इसमें कौनसी विचित्रता है ? अत्यन्त असत्‌ खरगोश के सींग, आकाशपुष्प आदि का संकल्पवश भान होना चिरदृष्ट है, कोई नई बात नहीं हे