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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । यन्मुनिव्याधयोरेतद्वृत्तं नानादशाशतम् । अन्यकारणकं किं स्यादेतत्किं वा स्वभावजम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : हे वत्स, जब विपश्चित्‌ यह कह रहा था तब सुने गये विपश्चित्‌ के वृत्तान्त को मानों अपनी आँखों से देखने के लिए सूर्य दूरतक फैली हुई किरणों के साथ या लम्बे लम्बे किरणरूपी पैरों से दूसरे लोक को गया

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ उनसठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ साठवाँ सर्ग सायंकाल के समय सभा का उठना तथा दूसरे दिन प्रातःकाल फिर पहले की नाईं लगना एवं भास की जीवन्मुक्तता और अविद्या का वर्णन ।