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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verses 9–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, verses 9–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 9-33

संस्कृत श्लोक

चिद्व्योममात्रकचनं संसारे सर्वतः शिवे । आस्थानास्थादि किं तज्ज्ञा यथासंस्थानमास्थित ॥ ९ ॥ समुद्यन्ति स्वतोऽम्भोधेर्वीचिवत्प्रतिभाकृताः । स्वात्मिकाः स्वात्मनो देवात्कार्यकारणदृक्तया ॥ १० ॥ स्फारं यत्परमं व्योम्नः स्वसंकल्पस्वसर्गवत् । तत्तेनैव जगद्बुद्धं कुतः पृथ्व्यादयोऽत्र के ॥ ११ ॥ भात्येवमयमाभासो नैव भाति च किंचन । ब्रह्मण्येव स्थितं ब्रह्म तदविद्याभिधं स्वतः ॥ १२ ॥ घनता चिद्धनेनेह चिद्व्योमैवाखिलं जगत् । इत्येव परमो बोध एतत्प्रौढिस्तु मुक्तता ॥ १३ ॥ चिद्व्योमशून्यतारूपमात्रमाभास आततः । इदमप्रतिघं शान्तं जगदित्येव भासते ॥ १४ ॥ ध्यायिनः क्षीणदेहस्य ध्याने दृक्त्वे क्षणं स्थिते । चिन्मात्रव्यतिरेकेण शक्तत्वं स्यात्किमुच्यताम् ॥ १५ ॥ चिद्धातुव्योमभागो यो भाति यत्र यथा यथा । तथा तथा स तत्रास्ते यावदित्थं स्वभावतः ॥ १६ ॥ अविचारवतो दृश्यभ्रान्तिर्गगनमय्यपि । जातितैमिरिकद्वीन्दुदोषवन्नोपशाम्यति ॥ १७ ॥ यदिदं दृश्यते किंचित्तद्ब्रह्मैव निरामयम् । चिदाकाशमनाद्यन्तं तत्कथं किं प्रशाम्यति ॥ १८ ॥ स्वमसन्त्यजतो रूपं स्वच्छसंवेदनात्मकम् । स्वप्नवत्कचनं स्वस्य यन्नाम तदिदं जगत् ॥ १९ ॥ शास्त्रार्थैस्तीक्ष्णया बुद्ध्या मिथो यन्न विकल्पनैः । कृत्वा सुप्तमिवात्मानं किंचिद्बुद्धेन बोध्यते ॥ २० ॥ रूढा येयमविद्येति संविदव्यभिचारिणी । भवतां ननु नास्त्येव सा सरित्स्विव पांसुभूः ॥ २१ ॥ यथा स्वप्नेऽवनिर्नास्ति स्वानुभूतापि कुत्रचित् । तथेयं दृश्यता नास्ति स्वानुभूताप्यसन्मयी ॥ २२ ॥ चिद्व्योममात्रमेवार्थाऽनलवद्भासते यथा । स्वप्ने तथैव जाग्रत्त्वेऽनलं स्वस्यैव लक्ष्यते ॥ २३ ॥ इदं जाग्रदयं स्वप्न इति नास्त्येव भिन्नता । सत्ये वस्तुनि निःशेषसमयोर्यानुभूतितः ॥ २४ ॥ नैतदेवमिति स्वप्नप्रबोधात्प्रत्ययो यथा । मृत्वामुत्र प्रबुद्धस्य जाग्रति प्रत्ययस्तथा ॥ २५ ॥ कालमल्पमनल्पं च स्वप्नजाग्रदितीह धीः । वर्तमानानुभवनसाम्यात्तुल्ये तयोर्द्वयोः ॥ २६ ॥ बाह्ये तदेवमित्यादिगुणसाम्यादशेषतः । न जाग्रत्स्वप्नयोर्ज्यायानेकोऽपि यमयोरिव ॥ २७ ॥ यदेव जाग्रत्स्वप्नोऽयं यः स्वप्नो जाग्रदेव तत् । नैतदेवं किलेत्यस्ति धीः कालेनोभयोरपि ॥ २८ ॥ आजीवितान्तं स्वप्नानां शतान्यनियतं यथा । अनिर्वाणमहाबोधे तथा जाग्रच्छतान्यपि ॥ २९ ॥ उत्पन्नध्वंसिनः स्वप्नाः स्मर्यन्ते बहवो यथा । तथैव बुद्धैः स्मर्यन्ते सिद्धैर्जन्मशतान्यपि ॥ ३० ॥ एवं समस्तसाधर्म्ये समस्तानुभवात्मनि । कचति स्वप्नवज्जाग्रज्जाग्रद्वत्स्वप्नवेदनम् ॥ ३१ ॥ यथा दृश्यं जगच्चेति नित्यमेकार्थतां गतौ । उभौ शब्दौ तथैवैतज्जाग्रत्स्वप्नात्मकौ स्मृतौ ॥ ३२ ॥ एवं स्वप्नपुरं स्फारं यथा व्योमैव चिन्मयम् । तथैवेदं जगदतः क्वाविद्या दृश्यते कुतः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे महामते, भास नामधारी इस विपश्चित्‌ का इतिहास आपने स्वयं ही देखा हे ओर इसके उन मन्त्रियों ने भी देखा हे । इसके पश्चात्‌ इन कथाओं से तत्त्वज्ञान से सम्पन्न हुआ, यह अविद्या के नष्ट होनेपर आप लोगों के सदृश जीवन्मुक्त हो जायेगा । चूँकि ब्रह्म ने अपने में अपनी सत्ता से “मे अविद्या हूँ” ऐसी संवित्‌ धारण की, इसलिए भ्रान्ति से ही इसका अविद्यमान भी स्वरूप सत्‌ के तुल्य दिखाई देता है । जब यह अविद्या ब्रह्मस्वरूपा ही है ब्रह्म से अन्यस्वरूपा नहीं है तब यह अधिष्ठानब्रह्ममात्रत्वेन परिज्ञात होकर तो यह उससे पृथक्‌ अस्तित्व नहीं रखती हे । इस प्रकार विविध प्रकार की सृष्टियों से शोभित होनेवाली यह अविद्या अनन्त है । मोहरूपी वसन्त में खिली हुई मंजरीसी यह जड, रमणीय ओर आसक्तिमयी है । वसन्त में खिली हुई मंजरी (बौर) भी विविध फलों से शोभित होती है । जड़ आसक्तिमयी यह अविद्या वन के बाँस में उत्पन्न हुई लम्बी शाखा की भाँति अन्त (सीमा) रहित हैं, चिद्‌अचिद्‌ ग्रन्थिवाली है, सरसरी दृष्टि से चिकनी चुपड़ी मालूम होती हे किन्तु अनुभव के समय इसके सुन्दर सुन्दर अंकुर सब कटि बन जाते हैँ । यह अविद्या अकाल में उत्पन्न हुई उत्पातसूचक पुष्पराशि की तरह मनोहारिणी है, अतएव अत्ऋ्तु में उत्पन्न पुष्पराशि की तरह इसमें व्यर्थ भी फल की आशंका होती है किन्तु है यह निपट निष्फल, इसलिए प्रशंसनीय अभिज्ञ जन कदापि इसकी ओर आकृष्ट नहीं होते । यद्यपि इसका कोई स्वरूप नहीं हे तथापि यह इतनी विशाल है कि नाना भुवनो को भर देती हे, अतएव प्राणियों से भरी हुई अज्ञान पूर्ण यह अविद्या भूतो से भरी हुई अन्धकारपूर्ण लम्बी रात्रि के समान है । यह आकाश में मिथ्या ही दिखाई दे रही तथा विचित्र ग्रन्थियों से वेष्टित केशों के गोलो की भ्रान्ति के तुल्य है, किन्तु तत्त्वदृष्टि से वास्तव में न दिखाई दे रही यह अस्तित्वशून्य है । विविध रंगों में रंगी हुई, गुणरहित, आकाश में फैली हुई अज्ञानकर्मरूप विविध उपद्रवो से पूर्णं यह अविद्या आकाश में फैली हुई, वृष्टि के उत्पात को सूचित करनेवाली, प्रत्यंचारहित रंगविरंगी इन्द्रधनुषलता के समान है । अज्ञानरूपी कल्लोल से आकुल, पाप प्रकर्षरूपी फेन से भरी, चक्राकार भँवरियों के तुल्य भ्रान्तियों की आवासभूत यह अविद्या जलकल्लोलों से भरी हुई मलिनता की वृद्धि से फेनयुक्त चक्र की नाई घूम रहे भँवरों से व्याप्त चोमासे की नदी की तरह है । यह रजोगुणी रक्ष अविद्या बीहड़ श्मशानभूमि की तरह है, जिसमें निरन्तर शून्य जगत्रूप सैकड़ों मृगतृष्णानदियाँ बहती हैं। श्मशानभूमि भी धूलिराशि से भरी हुई और रूक्ष रहती है एवं उसमें भ्रमवश शून्यरूपी सैकड़ों मृगतृष्णानदियाँ बहती दिखाई देती हैं । जैसे स्वप्ननगर में चिरकाल तक विचरण कर रहा पुरुष उसका अन्त नहीं पाता वैसे ही इस जाग्रत्‌ नाम के स्वप्नपुर में भ्रमणकर रहा पुरुष इसका अन्त नहीं पाता। जो एक दृश्यजाल में (प्रपंच में) स्थित देहों का त्यागकर चुके तथा मरण के समय में जिनके चित्त इस जगत्‌ के आकार से दृढ़ थे ऐसे जीवों के दृढ़ीभूत संकल्प ही इस जगत्‌ के शरीर के आकार से स्थित हुए हैं। वे चिदाकाश के कोशरत्नरूप संकल्पसमूह इस प्रकार स्थिररूप विमान्‌ नगर, भूमि आदि के आकार से सविकास (बिना संकीर्णता के) स्थित हैं। वेही असंख्य सिद्धलोक होकर आकाश में भासित होते हैं। वे अदृष्ट होते हुए भी सत्तावान्‌ हैं। भलीभाँति दृष्ट होनेपर भी असत्‌ हैं। उन सिद्धलोकों की भूमि सुवर्णमय, मणिमय, माणिक्यमय और मुक्तामय थी । वे सबके सब भक्ष्य, भोज्य, अन्न-पान आदि से पूर्ण थे और रसायनों के तालाब के तालाब उनमें भरे थे। उन सबमें शहद, आसव, दही, दूध और धी की नहर चारों ओर बहती थीं । वे सब सिद्धलोक चन्द्रमा की-सी आह्लादक आकृतिवाली महिलाओं से परिपूर्णं थे । उनमें सब ऋतुओं में प्रसिद्ध फल, फूल पल्लवं से लदे हुए वन ओर नदियों के प्रवाह प्रचुरमात्रा में थे, हाव-भावों से विशेष मनोहर ललनाओं से उन लोकों के घर भरे थे तथा केवल संकल्प करने मात्र से पूर्णरूप से उत्पन्न हुए सब विभवो की राशियों से वे सदा पूर्ण रहते थे। उनमें से कोई सिद्धलोक हजारों चन्द्रविम्बवाले ओर सैकड़ों सूर्यमण्डल वाले थे, कोई सुवर्ण-से ओर अमृत-से स्वच्छ वेषवाले जलमय भूतो के आवास थे । उनमें स्वेच्छा से अन्धकार ओर प्रकाश होता था, वे सबके सब नित्यानन्दमय थे । उनमें से कोई थोड़ी-सी रुई के समान हलके थे, अतः वायु उन्हें जहाँ चाहता था वहाँ उड़ा ले जाता था । कोई अपनी कल्पना के कारण क्षण में उत्पत्ति ओर विनाशवाले थे यानी अपनी इच्छा से क्षण में दर्शन और अदर्शनवाले थे । उनमें अन्न और पानका कोई पारवार न था एवं वे जरा ओर मरण से विहीन थे। उनकी रूपरेखा (बनावट) अचम्भा में डालनेवाली थी, उनका वैभव भी आश्चर्यमय था, सभी ऋतुओं के गुणों से वे सुरम्य थे तथा सकलकाममय थे । वे संकल्पसमूह शास्त्रीय सत्कर्म ओर उपासना से सत्कर्म ओर उपासना के फलके आकारवाले तत्‌-तत्‌ लोको में उनके भोम्य फलों के आकार से स्थिर मनों की परिणतिरूप हैं | वह परिणति इस प्रकार स्थूल भित्ति कैसे होगी । केवल ब्रह्ममात्रस्वरूप जगत्‌ में ब्रह्म से अन्य किसी का भी संभव नहीं हे । हे भद्र, यदि प्रकारान्तर हो तो जगत्‌ किंमय है कृपया कहें अर्थात्‌ मनोरथ आदि में मन के परिणामों का अस्तित्व, चिन्मात्ररूप होने से ही, देखा गया है इसलिए जगत्‌ के ब्रह्ममयात्मक होनेपर यह जो मैंने कहा है उसकी उपपत्तिपूर्वक सर्वथा संभावना है । यदि दूसरा कोई प्रकार हो तो यह जगत्‌ किंमय है यह वादी को कहना चाहिये