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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verses 5–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, verses 5–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 5-8

संस्कृत श्लोक

नानावयववानेक एवेहावयवी यथा । चिद्ब्रह्मैकमिदं व्योम तथैवं प्रतिभात्मकम् ॥ ५ ॥ ब्रह्म काश्चित्स्थिराः काश्चिदस्थिराः प्रतिभार्थवत् । देहावस्था इवात्मस्थाः स्थितमात्मनि खात्मनि ॥ ६ ॥ स्वात्मनि स्वप्नपुरवद्भानं चिति चमत्कृतिः । किं सारं किमसारं वा किं सत्किं वाप्यसद्भवेत् ॥ ७ ॥ परिज्ञातमिदं यावत्सर्वं चिद्व्योममात्रकम् । दृश्यं जगद्भवद्बुद्धं न सन्नासत्किमुच्यते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

स्नान और सायंसन्ध्या से निवृत्त होकर, भोजनकर ओर रात्रि में विश्राम कर प्रातःकाल में वे फिर सभास्थलपर आये जिस तरह वह सभा पहले बैठी थी उसी तरह बैठ गई । इसके पश्चात्‌ जैसे चन्द्रमा अमृत की वर्षा करता है वैसे ही अपने मुखमण्डल की प्रभा से आह्वादित करनेवाले वचन कह रहे मुनि महाराज उक्त प्रस्तुत कथा क्रम से कहने लगे : हे राजन्‌, यह अविद्या नहीं हे । असत्‌ होती हुई ही यह सत्‌ के समान स्थित है । विपश्चित्‌ इस प्रकार के महान्‌ प्रयत्न से भी इसका निर्णय नहीं कर सका, इसका पार नहीं पा सका जब तक अधिष्ठानभूत ब्रह्मरूप से इसका विज्ञान नहीं होता तभी तक यह कालतः चिरकाल तक, देशतः ओर वस्तुतः अनन्त मालूम होती है, किन्तु यह केवल अधिष्ठानभूत ब्रह्मरूप है एेसा जब इसका परिज्ञान हो जाता है तब यह मृगतृष्णा नदी के समान रहती ही नहीं है