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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verse 56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 56

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जिस किसी भी चेतन देह आदि का कभी चित्ताकाश में भान हुआ अथवा (भावी का (भविष्य में होनेवाले का) भी स्वप्न में भान देखने से) जिसका कभी भान नहीं हुआ अथवा जो अपूर्व ही हो उसका भी संकल्पभ्रान्तरूप कल्पनावश भान होता है। वह सब मनोमय ही है। वह उस भावना से स्वेच्छा से ही चलता है सैकड़ों प्रयत्नो से कभी वह नहीं चलता, यह सिद्ध हुआ, यह अर्थ है