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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verses 41–43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, verses 41–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 41-43

संस्कृत श्लोक

विद्धि तद्रूपमेवेदं भेदवेदनमित्यपि । चित्यन्तमागतः कोऽन्यो नाम स्याद्भेदवेदने ॥ ४१ ॥ चिद्व्योमैवाभेदबुद्धिश्चिद्व्योमैव च भेदधीः । द्वैताद्वैते चैकमेव तथा शान्तमखण्डितम् ॥ ४२ ॥ सदंशो बोधतद्ग्राह्यमय एव यथा तथा । दृष्टा य एव दृश्यं तद्द्वैतवेदनमेककम् ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए मन के अनुसार ही एक शरीर का त्याग कर जीव शीघ्र दूसरे शरीर का ग्रहण करता है, ऐसा कहते हैं। जीव जिस भाव से एक देहमयी बुद्धि का त्याग करता है उसभाव से ही दूसरी देहमयी बुद्धि को शीघ्र देखता है । शुभ (पुण्यकारिणी) जीव-संवित्‌ शुभ लोकों को देखती है और अशुभ (पापी) संवित्‌ अशुभ लोकों को देखती है और शून्य संवित्‌ शून्यात्मक लोकों को देखती है एवं चिरकालतक उनका अनुभव भी करती है । जो जीव-संवित्‌ कर्म ओर उपासना से शुद्ध है वह सूक्ष्म से सूक्ष्म दूसरे के सिद्धनगरों को ही देखती है और अपने सिद्धपुरों का अनुभव करती है । पापाचरण से अशुद्ध जो चिति है वह नरकों में दूसरों के भीषण दुःखों को देखती है और अपने घोर दुःखों का अनुभव करती है