Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verses 36–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 36,37
संस्कृत श्लोक
चिन्मयाकाशकचने क्वास्मिन्किल निराकृतेः ।
दृश्यनामन्यविद्याख्ये बन्धो मोक्षोऽथवा कुतः ॥ ३६ ॥
नाविद्या विद्यते नाम बन्धो बन्धो न कस्यचित् ।
मोक्षो न कस्यचिन्मोक्षश्चास्तिनास्तीति नास्त्यलम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
तब हम लोगों के संकल्प आदि मोघ (निष्फल) क्यो हैं ? ऐसा कोई प्रश्न करे तो तीव्रवेग न होने के
कारण ही हम लोगों के संकल्पो में मोघता है । यदि हमारे संकल्प में तीव्रवेग हो जाय तो तुम या और
कोई भी लोग आकाश में नगरों का निर्माण करते ही है ओर एकरसाभ्यास से ऐन्दवोपाख्यान में उक्त
न्याय से उन्हे प्राप्त भी करते हैं, ऐसा कहते है।
हे साधो, इस समय भी तुम चाहे ओर कोई लोग भी इसी तरह आकाश में तीव्र संवेगवाले संकल्पो
से नगरों का स्वेच्छा से निर्माण कर सकते हें एकरस आसक्ति से इस शरीर का त्यागकर थोड़े ही समय
में उन्हे प्राप्त कर सकते हैं