Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 131
एक सौ उनतीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तीसवाँ सर्ग मृग का श्रीवसिष्ठटजी के ध्यान से उत्पन्न अग्नि में प्रवेश तथा विपश्चित्-शरीर की प्राप्ति से पूर्वजन्म की स्मृति का वर्णन |
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- Verse 1श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : हे मुनिवृन्द, इसके उपरान्त श्रीरामचन्द्रजी श्रीवसिष्ठजी से बोले :…
- Verses 2–4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, जिस पुरुष की जिस चिरकाल उपासित देवता से बार-बार अभिलाषासिद्धि…
- Verses 5–10श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : पुण्यकर्मा मुनिवर श्रीवसिष्ठजी ने यह कहकर, वहाँपर अपने कमण्डल के…
- Verses 11–12इसके बीच में मुनिश्रेष्ठ श्रीवसिष्ठजी ने ध्यान में विचार कर अपने दृष्टिपातों से मृग को क्…
- Verse 13राजसभा में मुनि महाराज के ऐसा कहते ही जैसे वेग से छोड़ा गया बाण अपने लक्ष्य में प्रविष्ट…
- Verse 14ज्वालाओं के मध्य में प्रविष्ट हुआ वह दर्पण में प्रतिबिम्बित-सा तथा सन्ध्याकाल के मेघ में…
- Verse 15वह मृग सभासद लोगों के देखते देखते जैसे आकाश में हरिण-सा बादल का टुकड़ा दूसरी शक्ल का (मनु…
- Verses 16–18इसके उपरान्त ज्वालाओं के अन्दर सुवर्णकी-सी कान्तिवाला, रमणीय अंग प्रत्यंगों से मनोहर पुण्…
- Verses 19–20तदनन्तर वायु से बुझे हुए दीपक के समान वह ज्वालापुंज सभा के बीच से कहीं ऐसे ही विलीन हो गय…
- Verses 21–23तुल्य महाकान्ति वह भास नाम से प्रख्यात हुआ । मूर्तिमान् आभास-सा यह भास नाम से प्रसिद्ध ह…
- Verse 24इसके उपरान्त ध्यानमग्न उस भासने वहींपर बैठकर अपने शरीर में अपने पूर्वजन्म के संपूर्ण वृत्…
- Verses 25–27जब कि सभासद जन अपने अन्दर उत्पन्न हुए आश्चर्य से निश्चल बैठे थे, भास मुहूर्त-भर में अपना…
- Verse 28श्रीवसिष्ठजी ने उसके सिरपर अपने हाथ फेरते हुए उससे कहा : हे राजन्, आज चिरकाल से दुश्यमान…
- Verse 29इसके बाद श्रीरामचन्द्रजी के प्रति जय जयकार करते हुए प्रणाम कर रहे उससे श्रीदशरथजी ने आसन…
- Verse 30राजा श्रीदशरथजी ने कहा : हे राजन्, आपका स्वागत हो, आप इस आसन पर वैदिये । हे अनेक जन्म जन…
- Verse 31श्रीवसिष्ठजी ने कहा : महाराज दशरथ के यों कहनेपर भास नामधारी विपश्चित् विश्वामित्र आदि मु…
- Verse 32श्रीदशरथ ने कहा : खेद है, जैसे जंगली हाथी चिरकाल तक बाँधने के खूँटे से दुःख पाता है वैसे…
- Verses 33–34अहा, असमीचीन बोध से उत्पन्न हुई दुर्दृष्टि की बड़ी विषमगति है । उक्त दुर्दृष्टि आकाश में…
- Verses 35–58आश्चर्य हे चिदात्मा का आवरण करनेवाले मायास्वभावरूप विभव की, जो कि वस्तुतः शून्य है, कैसी…