Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 131 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
दशरथ उवाच ।
क्लिष्टोऽयं यदविद्यार्थं विपश्चिदविपश्चितः ।
तदहं चेष्टितं मन्ये कष्टोऽवस्तुनि किंग्रहः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : हे मुनिवृन्द, इसके उपरान्त श्रीरामचन्द्रजी श्रीवसिष्ठजी से बोले : हे
मुनिवर, किस उपाय से विपश्चित् देह के पुनः आविर्भाववश ओर ज्ञान द्वारा वास्तविक आत्मा के
आविर्भाववश इस विपश्चित् का दुःखान्त होगा ?
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ उनतीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तीसवाँ सर्ग मृग का श्रीवसिष्ठटजी के ध्यान से उत्पन्न अग्नि में प्रवेश तथा विपश्चित्-शरीर की प्राप्ति से पूर्वजन्म की स्मृति का वर्णन |