Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, Verses 25–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, verses 25–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 131 · श्लोक 25-27
संस्कृत श्लोक
चिदणोरुदरे सन्ति समस्तानुभवाणवः ।
शिलाः शैलोदर इव स्वच्छाः खात्मनि खात्मिकाः ॥ २५ ॥
स्वभावनिष्ठास्तिष्ठन्ति ते यदव्याकृतात्मनि ।
मा तिष्ठन्ति तु वै ते यदव्यावृत्ताः परे पदे ॥ २६ ॥
तदेव जगदित्युक्तं ब्रह्म भारूपमाततम् ।
पूर्वापरपरामर्शान्निपुणं निपुणाशयाः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
जब कि सभासद जन अपने अन्दर उत्पन्न हुए आश्चर्य से निश्चल बैठे थे, भास मुहूर्त-भर में अपना
सारा का सारा वृत्तान्त देखकर पूर्व जन्मों से लौट आया, ध्यानलोक से जाग गया । उसने उठकर मुनि,
राजा, सामन्त आदि के क्रम से सभापर दृष्टिपात किया। उसने श्रीवसिष्ठजी के निकट जाकर प्रसन्नता
के साथ उन्हे प्रणाम किया ओर हे ज्ञानसूर्यरूपी प्राण देनेवाले ब्रह्मन्, आपको नमस्कार है, यह
कहा