Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, Verses 16–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, verses 16–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 131 · श्लोक 16-18
संस्कृत श्लोक
व्योमस्थकन्दुकभ्रान्तपिपीलिकवदाकुलम् ।
अद्यापि संस्थिता राजन्न च खेदं व्रजन्ति ते ॥ १६ ॥
देशं भूगोलकस्यास्य यं यमासादयन्ति च ।
इहेव तत्र तत्रोच्चैरधश्चोर्ध्वं तथा दिशः ॥ १७ ॥
ते वदन्ति महाराज यद्यस्माभिरितोद्यतैः ।
न तावदन्तः संप्राप्तः संचराम इतः परम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके उपरान्त ज्वालाओं के
अन्दर सुवर्णकी-सी कान्तिवाला, रमणीय अंग प्रत्यंगों से मनोहर पुण्याकृति पुरुष दिखलाई दिया ।
सूर्यबिम्ब में सूर्य की तरह, चन्द्रविम्ब में चन्द्रमा की तरह, महान् जलराशि में वरुण की तरह अथवा
सान्ध्यकालीन मेघखण्ड में चन्द्रमा की तरह, आँखों की पुतली के मध्य में, दर्पण में, जल में और मणि
में प्रतिबिम्बत के समान अग्न्याधार भक्ति ही मानों पुरुषरुप हो सूर्य के समान कान्तिवाला पुरुष
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