Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, Verses 33–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 131 · श्लोक 33,34
संस्कृत श्लोक
दृश्यात्मकोर्वीवपुषस्त्वविद्यादृशो जवेनान्तपरीक्षणाय ।
देहेन देहेन जगत्प्रति प्राक् स्मृतेः सदाहं घनयत्नमासम् ॥ ३३ ॥
समाः सहस्रं विटपोऽहमासमन्तर्मनाश्चेतनभुक्तदुःखः ।
चित्तं विना पुष्पफलप्रताने वा कन्दवत्तत्तरसाङ्गरागः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
अहा, असमीचीन बोध से उत्पन्न हुई
दुर्दृष्टि की बड़ी विषमगति है । उक्त दुर्दृष्टि आकाश में ही सृष्टि का आडम्बर भ्रम दिखलाती हे । यह
कम आश्चर्य का विषय नहीं है कि सर्वव्यापक आत्मा में इन समस्त विखरे हुए कितने ही जगतां में
चिरकाल तक विपश्चित् ने भ्रमण किया