Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, Verses 19–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 131 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
इत्थं न किंचिदेवेदं ब्रह्मसंकल्पडम्बरम् ।
किंचित्संकल्पमज्ञानमनन्तं स्वप्नदृश्यवत् ॥ १९ ॥
कल्पनं तत्परं ब्रह्म परं ब्रह्मैव कल्पनम् ।
चिद्रूपं नानयोर्भेदः शून्यत्वाकाशयोरिव ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर वायु से बुझे हुए दीपक के समान वह ज्वालापुंज सभा के बीच से
कहीं ऐसे ही विलीन हो गया जैसे कि आकाश से सन्ध्याकाल का मेघ कहीं विलीन हो जाता हे । देवालय
कुटी की दीवारों के टूट-फूटकर धराशायी होनेपर उनके मध्य में स्थित भगवान् विष्णु आदि देवता की
प्रतिमा की तरह तथा पर्दे के अन्दर से बाहर निकले हुए नट की तरह वहाँ वह पुरुष खडा रह
गया