Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 131 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
स्वच्छकन्दुकवम्रीकन्यायेनानिशमत्र ते ।
भ्रमन्तो नाप्नुवन्त्यन्तमन्यत्वं संविदन्ति च ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह मृग सभासद लोगों के देखते
देखते जैसे आकाश में हरिण-सा बादल का टुकड़ा दूसरी शक्ल का (मनुष्य की शक्ल) बन जाता है
वैसे ही ज्वालाओं के मध्य में मनुष्य के आकार को प्राप्त हो गया