Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, Verses 11–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 131, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 131 · श्लोक 11,12
संस्कृत श्लोक
भावाः पतन्तो धावन्ति तस्याधः सर्वतोङ्गकम् ।
यत्रोत्पतन्तो गच्छन्ति तदूर्ध्वमिति शब्दितम् ॥ ११ ॥
तत्रैकदेशे विद्यन्ते वटधानाभिधानकाः ।
जातास्तेषां त्रयो राजन् राजपुत्राः पुराभवन् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके बीच में मुनिश्रेष्ठ श्रीवसिष्ठजी ने ध्यान में विचार कर अपने दृष्टिपातों से मृग को
क्षीणपाप करते हुए वहि के प्रति कहा : भगवन् अग्निदेव, इसकी पूर्व जन्म की भक्ति का स्मरण कर इस
मनोहर मृग को दयावश विपश्चित् बना दीजिये