Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 13
बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग॑ माया के कार्य में देश आदि की अपेक्षा का अभाव तथा परमाणु के उदर में इन्द्र के राज्य की कल्पना का विस्तार-यह वर्णन |
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- Verse 1देश कालादि निर्माणपूर्वक केदन विदुः ˆ इत्यादि जो पूर्व सर्य में कहा गया है, उसका उपपादन क…
- Verse 2शान्त, पवन के अन्दर स्थित सुगन्ध या प्रकाश से भी अति सूक्ष्म, लघु और स्वच्छ यह त्रिलोकी म…
- Verses 3–4हे साधो, चिति के चमत्कारमात्ररूप से दृढ़ इस जगद्गूपी अणु की अपेक्षा वायु के अन्तर्गत सौरभ…
- Verse 5पूर्वसिद्ध देश ओर काल की अपेक्षा न रखनेवाले तथा दूसरे के अनुभव में न आने से परम सौम्यरूप…
- Verse 6कभी कहीं किसी एक कल्पवृक्ष में (सब तरह की कल्पनाओं के आधारभूत मायाशबलब्रह्म मे युग की सन्…
- Verse 7उस फल का वर्णन करते है / वह फल अन्य फलों से विलक्षण था । वह सुर ओर असुर आदि अनेक विविध भू…
- Verse 8वह फल चिति की चमत्कृति रूप विचित्र रचनाशक्ति से सुन्दर, बहुत बड़ा, वासनारूपी रस से स्थूल,…
- Verse 9पूर्वोक्त महान् ब्रह्मरूपी कल्पतरु में आविर्भूत सूक्ष्म जगत्की सत्तारूपी करोड़ों लताओं…
- Verses 10–11ज्ञानरूपी विकसित मुखवाला, अनेक नदी और समुद्ररूपी नाडियोंसे आवृत पंचतन्मात्ररूपीकोश में स्…
- Verse 12उस गूलर के भीतर तीनों भुवन का स्वामी देवताओं का ईश इन्द्र ऐसे रहता था, जैसे क्षौद्रकुम्भ…
- Verse 13अपने अन्तःकरण में आत्मा का निरन्तर विचार करनेवाला पूर्वापरवेत्ताओं में श्रेष्ठ वह महात्मा…
- Verses 14–15इसके बाद अपने पराक्रम से सुशोभित नारायण आदि जब कहीं क्षीर-सागर में शयन कर रहे थे तव अकेले…
- Verse 16और शत्रु उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे । शत्रुओं के पीछा करने पर दसों दिशाओं में बड़ वेग से भ…
- Verses 17–18इसके पश्चात् जब उसके शत्रुओं की दृष्टि इधर-उधर कहीं थोडी देर के लिए भ्रान्त हो गयी तब अप…
- Verses 19–20वहाँ जाते ही वह शीघ्र विश्राम करने लगा । चिरकाल के बाद उसने वहाँ शान्ति प्राप्त की । तदनन…
- Verse 21उस गृह के भीतर स्थित इन्द्र ने एक ऐसा कल्पित नगर देखा, जहाँ पर चहारदीवारियों से धिरे मणि-…
- Verse 22उसके बाद उस नगर के भीतर पहुँचकर इन्द्र ने एक देश देखा, जिस देश के भीतर अनेक प्रकार के पर्…
- Verse 23इसके अनन्तर उसी तरह के संकल्प से युक्त इन्द्र ने भूलोक का अवलोकन किया जो, अनेक पर्वतो, सम…
- Verse 24इसके पश्चात् वैसे ही संकल्प से युक्त इन्द्र ने तीनों जगत् का अनुभव किया, जो पाताल, पृथि…
- Verse 25तदनन्तर अनेक तरह के भोगों से परिपूर्ण वह इन्द्र देवताओं के अधीशपन के पद पर देवलोक में अधि…
- Verse 26तत्पश्चात् अनिन्दित वह इन्द्र जीवन के अन्त में इस पांचभौतिक शरीर का त्याग कर, तैलरहित दी…
- Verse 27उसका पुत्र कुन्द तीनों लोक का राजा हुआ ओर पुत्र उत्पन्न करके समय से जीवन का अन्त आने पर व…
- Verse 28उस कुन्द का भी लड़का अपने पिता के ही समान बहुत वर्षो तक राज्य करके अपने पुत्र को राज्यसिह…
- Verse 29हे सुन्दर, इस तरह उस सुरेश के हजारों पुत्र-पौत्र आदि हो गये । आज भी उनके उस राज्य में अंश…
- Verse 30हे विद्याधर, इस रीति से जैसा कि मैंने तुमसे वर्णन किया, सूर्य प्रकाश से पवित्र उस त्रसरेण…