Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 13, Verses 10–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 13, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
मोक्षद्धारविकास्यास्यं सरिदब्धिशिरावृतम् ।
मात्रापञ्चककोशस्थं तरत्तारकसीकरम् ॥ १० ॥
कल्पावसानजरठं काककोकिलगाम्यथ ।
पतितं शान्तिमायातं क्वाप्यन्तावासनं गतम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानरूपी विकसित
मुखवाला, अनेक नदी और समुद्ररूपी नाडियोंसे आवृत पंचतन्मात्ररूपीकोश में स्थित, ऊपर में
तैर रहे नक्षत्रोरूपी हिमकणों से परिपूर्ण, महाकल्प के अवसान में पककर गिरने में उन्मुख, तदनन्तर
मूर्खरूपी कौवों या विवेकी जनरूपी कोकिलो से भक्ष्यमाण गिरने पर शान्ति को प्राप्त तथा कहीं
पर वासनामात्र शेषस्वरूप नाश या ब्रह्मभाव को प्राप्त होनेवाला वह फल था