Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 13, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 13, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
इत्यद्ययावदमरेश्वरवंश एव संकल्पिते जगति शक्रपदं विधत्ते ।
तस्मिन्क्षतेऽपि गलितेऽपि हतेऽपि नष्टे क्वाप्यम्बरे दिनकरातपपावनाणौ ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
हे विद्याधर, इस रीति से जैसा कि मैंने तुमसे वर्णन किया, सूर्य प्रकाश से पवित्र उस
त्रसरेणु के आकाश प्रदेश में कहीं, क्षत, गलित, हत या सर्वथा नष्ट हो जाने पर भी इन्द्र के
संकल्पित त्रसरेणु के अन्दर स्थित जगत् में उस अमरेश्वर का वंश ही इन्द्र के राज्य का अब
भी पालन कर रहा है