Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 13, Verses 17–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 13, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 17,18
संस्कृत श्लोक
तद्भान्तदृष्टिष्वरिषु मनाक् छिद्रमवाप्य सः ।
प्रशमं कायसंकल्पं नीत्वा स्वं स्वान्तरे बहिः ॥ १७ ॥
कमप्यर्कांशुकोशस्थं त्रसरेणुं विवेश सः ।
संविद्रूपतया पद्मकोशं मधुकरो यथा ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके पश्चात् जब उसके
शत्रुओं की दृष्टि इधर-उधर कहीं थोडी देर के लिए भ्रान्त हो गयी तब अपने छिपने का किंचित्
अवसर पाकर वह अपने स्थूलाकार संकल्प को अपने अन्तःकरण के अन्दर ही सूक्ष्मभभूत में विलीन
करके अत्यन्त अणु बनकर बाहर सूर्य की किरणों के कोश में स्थित किसी एक त्रसरेणु के भीतर
अपने संविद्रूप प्रवेश संकल्प से ऐसे प्रविष्ट हो गया, जैसे पद्मकोश के भीतर मधुकर प्रविष्ट हो
जाता है