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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 13, Verses 19–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 13, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 19,20

संस्कृत श्लोक

स तत्राशु विशश्राम चिरादाश्वासमाययौ । अथ विस्मृतसंग्रामो निवृत्तिं समुपागमत् ॥ १९ ॥ कल्पितं सद्म तत्राथ स क्षणादनुभूतवान् । तस्मिन्सद्मनि पद्मान्ते रेमे स्व इव विष्टरे ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ जाते ही वह शीघ्र विश्राम करने लगा । चिरकाल के बाद उसने वहाँ शान्ति प्राप्त की । तदनन्तर बहुत दिनों तक वहीं पड़े रहने के कारण वह अपने संग्राम को भूल गया, जिससे बाहर निकलने की उसकी स्मृति भी समाप्त हो गई | वहाँ पर उसने अपने रहने के लिए एक घर की कल्पना की ओर तत्काल ही उसका अनुभव किया । उस अपने कल्पित घर के भीतर पद्मासन के ऊपर बैठकर उसने ऐसे रमण किया, जैसे कि अपने स्वर्गलोक में स्थित प्रसिद्ध सिंहासन के ऊपर बैठकर रमण करता था