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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 38

सैंतीसवाँ सर्ग समाप्त अड़तीयवाँ सर्ग अनन्त चिन्मात्रस्वरूप महादेवजी का बाह्य ध्यान से पूजन ओर ज्ञान से महापुण्यात्मक मुक्तिरूप फल इसका वर्णन |

34 verse-groups

  1. Verse 1श्री महेश्वर ने कहा : महर्ष, नियति के नाटक का साक्षीभूत यह चिदात्मा ही सबसे बडा देव है, य…
  2. Verse 2आगे कही जानेवाली रीति से किये गये उसके पूजन में सम्पूर्ण देवताओं का पूजन अन्तभूतहो जाता ह…
  3. Verse 3सबके स्वरूपभूत, छः प्रकार के ऐश्वर्यों से परिपूर्ण इसी अपने आत्मदेव की आगे कहे जानेवाले ब…
  4. Verse 4हे महाबुद्धे, जिस बाह्य क्रम से इस आत्मदेव का पूजन किया जाता है, उसे पहले सुनो । ओर तदनन्…
  5. Verse 5महर्ष, पूजन के जितने क्रम हैं, उन सबमें पहले शास्त्रोक्त संस्कार एवं स्नान, आचमन आदि से प…
  6. Verse 6हे महर्षे, भीतर का ध्यान ही इस आत्मदेव की पूजा है यानी ध्यान ही पूजा की सामग्री ओर स्वयं…
  7. Verse 7चिद्रूप, लाखों सूर्यो के समान देदीप्यमान, सूर्य आदि समस्त प्रकाशक तेजो एवं बुद्धिवृत्तियो…
  8. Verse 8इस नियति-नाटक के साक्षी परमात्मा का इतना बड़ा स्वरूप है कि असीम सबसे बडे आकाश का जो विपुल…
  9. Verse 9सीमाशून्य दिशाओं के किनारों का यह जो विस्तार है, वही उसका भुजमण्डल है ओर उसी से वह राजित…
  10. Verse 10उसके हृदय-कोश के एक कोने में ब्रह्माण्ड-समूहों की पंक्तियों की पंक्तियाँ छिपी हुई हैं; वह…
  11. Verse 11वह नीचे-ऊपर, चारों दिशाओं एवं उपदिशाओं में ब्रह्मा, इन्द्र, हरि, हर, आदि प्रमुख देवस्वामि…
  12. Verse 12इस जगत्‌-त्रय में विभिन्न-विभिन्न प्रकार के पदार्थों का निर्माण करने के लिए विनिर्मित यन्…
  13. Verse 13नियति के नाटक का साक्षीभूत यह चिदात्मा ही वह परम देव है । यही समस्त पदार्थों का आश्रय, सर…
  14. Verse 14वही देव घट में, पट में, वट में, दीवार में, शकट में ओर वानर में स्थित है । यही परमदेव शिव,…
  15. Verse 15अनेक विध घट, पट आदि आकृतियों को लेकर असंख्य पदों से बोधित होनेवाली तथा उन आकृतियों को छोड…
  16. Verse 16पर्वतो एवं चोदह भुवनो के असीम विस्तार से युक्त यह ब्रह्माण्ड-मण्डल इस आत्मदेव के किसी एक…
  17. Verse 17अथवा सभी प्राणियों के जो कान, आँख, मस्तक, हाथ आदि अवयव हैं, वे सब इस आत्मदेव के ही हैं यो…
  18. Verses 18–19जो सभी जगह दर्शन- शक्ति से परिपूर्णं हे यानी सर्वत्र देखता है; जो चारों ओर प्राण-शक्ति से…
  19. Verse 20निरन्तर समस्त पदार्थो के कर्ता, सबको अपने-अपने संकल्पो के अनुसार समस्त पदार्थो का प्रदान…
  20. Verse 21उक्त प्रकार से ध्यानकर तदनन्तर उस देवाधिदेव की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए । हे ब्रह्मज्ञो…
  21. Verse 22महर्षे, स्वानुभवस्वरूप इस आत्मचैतन्य का पूजन न गन्ध आदि के उपहार से न दीप से, न धूप से ओर…
  22. Verse 23न तो अन्नदान आदि दानां से, न चन्दन के विलेपनं से, न कुंकुम, कर्पूर एवं नैवेद्य से ओर न इत…
  23. Verse 24महर्षे, किसी भी प्रकार के कष्ट के बिना प्राप्त होने योग्य शीतल, अविनाशी अमृतस्वरूप एकमात्…
  24. Verse 25पूर्वोक्त चिन्तन भी इसी बोध का एक अंग है, अतः यही पूजा सर्वपूजाओं मे प्रधान है, इस आशय से…
  25. Verse 26इस पूजा के लिए कालविशेष का नियम नहीं है, इसलिए वह सर्वदा ही अनुष्ठान योग्य है, यह कहते है…
  26. Verse 27उत्कृष्ट आस्वाद से युक्त (७) तथा कुसुम समर्पण आदि बाह्म-चेष्टाओं से निर्मुक्त ध्यानरूप अम…
  27. Verse 28चूँकि, इस आत्मदेव के लिए शुद्धसंवेदनरूप ध्यान ही प्रियतम वस्तु है, अतः ध्यान ही उसके लिए…
  28. Verse 29ध्यान से अभिव्यक्त हुआ चैतन्य ही पुष्प-प्रयोजनस्वरूप होने से पुष्प है, पूजा के अन्यान्य स…
  29. Verse 30हे मुने, यह आत्मदेव ध्यान से ही अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति प्राप्त करता है और तदनन्तर वह म…
  30. Verses 31–33अब तत्त्व-साक्षात्कार के अभावकाल में एकमात्र पूर्वोक्त ध्यान से भी उसके उत्कर्षानुसार फल…
  31. Verse 34एक सौ निमेषपर्यन्त इस प्रकार (इस ध्यान से) देव की पूजाकर मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्…
  32. Verse 35इसी प्रकार मध्याहनकाल तक पूजन करने से एकलक्ष राजसूय यज्ञों का फल प्राप्त होता है। और इसी…
  33. Verse 36महर्षे, जो यह आत्मदेव का उत्तम बाह्मपूजन मैंने तुमसे कहा है, यही परम योग है, यही वह परम (…
  34. Verse 37उक्त बाह्य-पूजा की प्रशंसा कर रहे भगवान्‌ शंकर उपसंहार करते हैं। हे आत्मरूप, समस्त पापों…