Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

देहकोणोऽस्य कस्मिंश्चित्स्वाङ्गावयवतां गतम् । विचिन्तयेन्महादेवं सहस्रश्रवणेक्षणम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा सभी प्राणियों के जो कान, आँख, मस्तक, हाथ आदि अवयव हैं, वे सब इस आत्मदेव के ही हैं यों इसके विश्वरूप का चिन्तन करना चाहिए, यह कहते है । महर्षे, जिसे हजारों कान एवं आँखें हैं, हजारों मस्तक हैं और जो (स्वयं) हजारों भुजाओं से विभूषित है, ऐसे शान्तस्वभाव महादेवजी का चिन्तन करना चाहिए