Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
बहिरन्तश्च सर्वात्मा सदा स्वात्मा सुबुद्धिभिः ।
विविधेन क्रमेणैव भगवान्परिपूज्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
सबके स्वरूपभूत, छः प्रकार के ऐश्वर्यों से परिपूर्ण
इसी अपने आत्मदेव की आगे कहे जानेवाले बाह्य ओर आभ्यन्तर दो प्रकारो से तत्त्वज्ञो द्वारा निरन्तर
पूजा की जाती है