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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

ध्यानमर्घ्यं च पाद्यं च शुद्धसंवेदनात्मकम् । ध्यानसंवेदनं पुष्पं सर्वं ध्यानपरं विदुः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

ध्यान से अभिव्यक्त हुआ चैतन्य ही पुष्प-प्रयोजनस्वरूप होने से पुष्प है, पूजा के अन्यान्य सम्पूर्ण उपचार ध्यान के पीछे हैं यानी ध्यान की बराबरी नहीं कर सकते, ऐसा मुनि लोग कहते है । अतः ध्यान को छोड़कर और किसी भी दूसरे उपाय से यह आत्मदेव प्राप्त ही नहीं किया जा सकता