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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः । ध्यानवल्युपहारेण स्वयमात्मानमात्मना ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ निमेषपर्यन्त इस प्रकार (इस ध्यान से) देव की पूजाकर मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥ ३ २॥ उक्त प्रकार से आधी घड़ी पर्यन्त इस अपने आत्मरूप ईश्वर की पूजाकर मनुष्य हजार अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है॥ ३ ३॥ ध्यानरूप बलि के उपहार से स्व-स्वरूप अपनी आत्मा की अपने-आप एक घड़ी भर जो पूजा करता है, वह राजसूययज्ञ (70) फल प्राप्त करता है