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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

एतत्पवित्रमखिलाघविघातहेतुं यस्त्वाचरिष्यति नरः क्षणमप्यखिन्नः । तं वन्दयिष्यति सुरासुरलोकपूगः प्राप्तास्पदं जगति मामिव मुक्तमात्मन् ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त बाह्य-पूजा की प्रशंसा कर रहे भगवान्‌ शंकर उपसंहार करते हैं। हे आत्मरूप, समस्त पापों के विनाश में हेतुभूत एवं पवित्र यह उक्त प्रकार का ध्यानरूप पूजन जो कोई मनुष्य विक्षेप ओर खेद से रहित होकर एक क्षण भी करेगा, क्रमशः समस्त बन्धनों से निर्मुक्त होकर ब्रह्मतत्त्व को प्राप्त हुए उसकी जगत्‌ में सुर एवं असुर लोगों का समूह जैसी मेरी वन्दना करता है वैसी ही वन्दना यानी अभिवादन, स्तुति आदि से पूजा करेगा