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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 111

एक सौ कसर्वो सर्ग समाप्त चूडाला का आख्यान समाप्त एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग जैसे चूडाला रानी ने राजा को सबका त्याग कराया, वैसे ही कचनामक अपने पुत्र को बृहस्पति ने सबका त्याग कराया और अन्त मेँ अहंकार के त्याग से वह पूर्ण आत्मज्ञानी बन गया-यह वर्णन |

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  1. Verses 1–5महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, यह शिखिध्वज की छोटी-सी कहानी मेने आपसे आद्योपान्त कही…
  2. Verses 6–16जाने के लिए कटिवद्ध हो गया । वह पद ओर पदार्थ का उत्तम ज्ञाता था । वह अपने पिता बृहस्पति स…
  3. Verses 17–23शरत्‌-काल में आकाशतल की नाई उसने वर्षाकाल में गुफा आदि का आश्रय कर मेघवर्षण आदि का परित्य…
  4. Verses 24–29त्रिपुर का दाह करने पर जैसे अघुररो का स्वयं दाह हो गया, उस तरह देह, इन्द्रिय आदि का त्याग…
  5. Verse 30और आत्मा का त्याग भी नहीं हो सकता, क्योकि वह त्याग का विषय है ही नहीं, इस आशय से कहते हैं…
  6. Verses 31–35सत्य है, जब तक उसके साक्षी का परिचय नहीं हो जाता, तब तक उसका परित्याग करना असम्भव है, परन…
  7. Verse 36सब प्रपच यदि मिथ्या है, तो कौन-सी चीज सत्य है, इसे कहते हैं - एक, आदि ओर अन्त से रहित, चै…
  8. Verse 37है, यह कहते हैं । सभी जगह ओर सभी प्राणियों मे निरन्तर सब ओर से प्रकाश करनेवाला वही एक आत्…
  9. Verses 38–39ऐसी स्थिति में द्रष्टा ओर दृश्यों के बीच में यह अहंकार है कौन, किस निमित्त से उत्पन्न हुआ…
  10. Verses 40–41तब मैं कौन हूँ ? देश, काल आदि परिच्छेदों से शून्य, स्वच्छ, निरन्तर उदयस्वभाव, व्यापक सब प…