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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, Verses 38–39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, verses 38–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 38,39

संस्कृत श्लोक

अत्र कोऽयमहंभावः कुतो वा कथमुत्थितः । क्वाप्सु जातो रजोराशिः क्वानलादुत्थितं जलम् ॥ ३८ ॥ अयं सोऽहमिति व्यर्थं प्रत्ययं त्यज पुत्रक । तुच्छं परिमिताकारं दिक्कालविवशीकृतम् ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी स्थिति में द्रष्टा ओर दृश्यों के बीच में यह अहंकार है कौन, किस निमित्त से उत्पन्न हुआ, और किस तरह का है, यह कहना अत्यन्त ही विचारणीय है यानी कह ही नहीं सकते, ऐसा कहते है। द्रष्टा और दृश्य के बीच में यह कौन-सी अहंकार नाम की वस्तु है, किस हेतु से उत्पन्न हुई और उसका स्वरूप क्या है ? कोई कह सकता है ? कोई भी नहीं । क्या कहीं जल में शुष्क धूलिराशि या अग्नि से उत्पन्न जल किसीने देखा ? अर्थात्‌ किसीने भी नहीं । हे पुत्र, यह पिता आदि से उत्पन्न हुआ देह आदि मैं हूँ, इस व्यर्थ बुद्धि को छोड़ दो जो कि तुच्छ, परिमिताकार और देश-काल के द्वारा हुए वृद्धि आदि विकारों से परिणत हुई है