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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, Verses 17–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, verses 17–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 17-23

संस्कृत श्लोक

पुनर्वर्षत्रयेणैष कस्मिंश्चित्काननान्तरे । तत्याजाम्बुदवर्षादि शरदीव नभस्तलम् ॥ १७ ॥ उपासैको दिगन्तेषु शान्तशून्यवपुः श्वसन् । दूयमानमनाः प्राप तमेव पितरं गुरुम् ॥ १८ ॥ कृतपूजाक्रमो भक्त्या समालिङ्गितपुत्रकम् । अपृच्छत्स कचो भूयः खेदगद्गदया गिरा ॥ १९ ॥ कच उवाच । तात सर्वं परित्यक्तं कन्थां वेणुलताद्यपि । तथापि नास्ति विश्रान्तिः स्वपदे किं करोम्यहम् ॥ २० ॥ बृहस्पतिरुवाच । चित्तं सर्वमिति प्राहुस्तत्त्यक्त्वा पुत्र राजसे । चित्तत्यागं विदुः सर्वत्यागं सर्वविदो जनाः ॥ २१ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्त्वा वाक्पतिः पुत्रं पुप्लुवे तरसा नभः । अन्वियेष कचश्चित्तं परित्यक्तुमखिन्नधीः ॥ २२ ॥ चिन्तयन्नप्यसौ चित्तं न यदा वेद कानने । तदा संचिन्तयामास धियैव पितरं ययौ ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

शरत्‌-काल में आकाशतल की नाई उसने वर्षाकाल में गुफा आदि का आश्रय कर मेघवर्षण आदि का परित्याग कर दिया । शरद्‌ आदि ऋतुओं में गुफा आदि का परिहार कर अनावृत दिशाओं में रहने लगा उसका शरीर शान्त ओर सुन्न हो गया था तथा वह साँसमात्र ले रहा था। तीन वर्ष के बाद किसी एक जंगल में फिर अपने गुरु उसी पिताजी को खिन्न-चित्त उसने प्राप्त किया भक्ति से उसने अपने पिताजी का पूजन, अभिवादन आदि किया, पिता ने भी अपने पुत्र का आलिंगन किया, अनन्तर खेद के कारण गद्गद वाणी से वह कच पूछने लगा | कच ने कहा : तातचरण, मैंने सबका त्याग कर दिया । कन्था, दण्ड, कमण्डलु आदि का भी त्याग कर दिया तथापि अपने आत्मपद में मेरी स्थिति नहीं हुई, अब मैं क्या करूँ ? वृहस्पति ने कहा : पुत्र, चित्त ही सब कुछ हे, अतः उसीका त्यागकर तुम अपने स्वरूप में विराजित हो जाओगे | सर्वज्ञ लोग चित्तत्याग को ही सर्वत्याग कहते हैँ । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, पुत्र से एेसा कहकर वृहस्पति शीघ्रता से आकाश में उड गये, अनन्तर अन्तःकरण से खेद निकाल कर वह कच छोड़ने के लिए चित्त की खोज करने लगा । खोज करने पर भी जब उसे चित्त की प्राप्ति नहीं हुई, तब वह सोचने लगा और बुद्धि से ही अपने पिताजी के समीप गया यानी पिताजी का स्मरण किया