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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, Verses 1–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, verses 1–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 1-5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एतत्ते सर्वमाख्यातं शिखिध्वजकथानकम् । अनेन गच्छन्मार्गेण न कदाचन खिद्यसे ॥ १ ॥ एतां दृष्टिमवष्टभ्य रागद्वेषविनाशिनीम् । नित्यं नीरागया बुद्ध्या तिष्ठावष्टब्धतत्पदः ॥ २ ॥ यथा शिखिध्वजो राज्यं कृतवानेवमीदृशम् । राम व्यवहरन्राज्ये भोगमोक्षमयो भव ॥ ३ ॥ शिखिध्वजक्रमेणैव यथा बोधमवाप्तवान् । कचो बृहस्पतेः पुत्रस्तथा बुध्यस्व राघव ॥ ४ ॥ श्रीराम उवाच । बृहस्पतेर्भगवतः पुत्रोऽसौ भगवान्कचः । यथा प्रबुद्धो भगवन्समासेन तथा वद ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, यह शिखिध्वज की छोटी-सी कहानी मेने आपसे आद्योपान्त कही | इस मार्ग का अनुसरण कर रहे आप कभी भी खिन्न नहीं होगे यानी आपकी सारी चिन्ताएँ निकल जायेगी । भद्र, राग और द्वेष का नामों-निशान मिटा देनेवाली, शिखिध्वज की वृत्ति का अवलम्बन कर राग-द्वेष से निर्मुक्त बुद्धि से प्रत्यक्ष किये गये पारमार्थिक पूर्णानन्द पद से सुशोभित होकर निरन्तर स्थित रहिए । हे रामभद्र, जिस प्रकार राजा शिखिध्वज ने उस तरह व्यवहार करते हुए राज्य किया, उसी प्रकार से आप भी राज्य में व्यवहार करते हुए भोग और मोक्ष से भरपूर रहिए । हे राघव, शिखिध्वज के प्रसिद्ध सर्वत्यागरूप उपाय से ही जैसे बृहस्पति के पुत्र कच ने ज्ञान प्राप्त किया, वैसे ही आप भी ज्ञान प्राप्त कीजिए । श्रीरामजी ने कहा : भगवन्‌, बृहस्पति के पुत्र समस्त वैभवं से परिपूर्ण कच ने जिस क्रम से ज्ञान प्राप्त किया उस क्रम को संक्षेपतः मुञ्चसे कहिए

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ कसर्वो सर्ग समाप्त चूडाला का आख्यान समाप्त एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग जैसे चूडाला रानी ने राजा को सबका त्याग कराया, वैसे ही कचनामक अपने पुत्र को बृहस्पति ने सबका त्याग कराया और अन्त मेँ अहंकार के त्याग से वह पूर्ण आत्मज्ञानी बन गया-यह वर्णन |