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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, Verses 6–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, verses 6–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 6-16

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । श्रृणु राजन्कथां श्रीमाञ्छिखिध्वजवदेव सः । प्रबोधं परमं यातो देवदेशिकजः कचः ॥ ६ ॥ बालभावात्समुत्तीर्णः संसारोत्तरणोन्मुखः । कचः पदपदार्थज्ञो बृहस्पतिमभाषत ॥ ७ ॥ कच उवाच । भगवन्सर्वधर्मज्ञ कथं संसृतिपञ्जरात् । अस्मान्निर्गम्यते ब्रूहि जन्तुना जीवतन्तुना ॥ ८ ॥ बृहस्पतिरुवाच । अनर्थमकरागारादस्मात्संसारसागरात् । उड्डीयते निरुद्वेगं सर्वत्यागेन पुत्रक ॥ ९ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्याकर्ण्य कचो वाक्यं पितुः परमपावनम् । सर्वमेव परित्यज्य जगामैकान्तकाननम् ॥ १० ॥ बृहस्पतेस्तद्गमनं नोद्वेगाय बभूव ह । संयोगे च वियोगे च महान्तो हि महाशयाः ॥ ११ ॥ अथ वर्षेषु जातेषु त्रिषु पञ्चसु सोऽनघ । पुनः प्राप महारण्ये कस्मिंश्चित्पितरं कचः ॥ १२ ॥ परिपूज्याभिवाद्यैनं समालिङ्गितपुत्रकम् । अपृच्छद्वाक्पतिं भूयः स कचः कान्तया गिरा ॥ १३ ॥ कच उवाच । अद्येदमष्टमं वर्षं सर्वत्यागः कृतो मया । तथापि तात विश्रान्तिं नाधिगच्छाम्यनिन्दिताम् ॥ १४ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । एवमार्तवचस्तस्मिन्कचे वदति कानने । सर्वमेव त्यजेत्युक्त्वा वाक्पतिर्दिवमुद्ययौ ॥ १५ ॥ गते तस्मिन्कचो देहाद्वल्कलाद्यप्यथात्यजत् । गतेन्द्वभ्रार्कतारेण शरद्व्योम्ना समोऽभवत् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

जाने के लिए कटिवद्ध हो गया । वह पद ओर पदार्थ का उत्तम ज्ञाता था । वह अपने पिता बृहस्पति से कहने लगा । कच ने कहा : हे भगवन्‌, हे सब धर्मो का ज्ञान रखनेवाले पिताजी, तन्तु के सदृश हजारों बन्धनो को देनेवाले जीव से युक्त मेरे-जैसा जन्तु इस संसाररूपी पिंजडे से कैसे बाहर निकल सकता है, यह आप कहिये । वृहस्पति ने कहा : हे पुत्र, अनर्थरूप हजारों मगरों के निवासस्थानभूत इस संसाररूपी सागर से किसी तरह के उद्वेग के बिना किये गये सर्वत्याग से तत्काल ही जन्तु निकल जा सकता हे । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, अपने पिता का परम पवित्र उस तरह का वचन सुनकर कच सभीका परित्याग करके एकान्तवन में चला गया पुत्र के चले जाने से बृहस्पति को चित्त में कुछ भी उद्वेग नहीं हुआ, क्योकि जो महान्‌ होते हैं, वे संयोग ओर वियोग दोनों में सुमेरु पर्वत के सदुश निश्चल मनवाले होते हैं यानी उन दोनों दशाओं मेँ महात्माओं के मन में कुछ भी उद्वेग आदि विकार नहीं होते | हे पापशून्य, वन में जाने के अनन्तर उसे जब आठ वर्ष व्यतीत हो गये, तब किसी महाअरण्य में उस कच ने अपने पिताजी को फिर प्राप्त किया जो कि उसके चित्त का परिपाकतारतम्य जानकर बचे हुए का त्याग कराने के लिए ही आये थे । कच ने पहले अपने पिताजी की विधिपूर्वक पूजा की, फिर उन्हें प्रणाम किया । बृहस्पति ने भी अपने पुत्र का आलिंगन किया । इतना होने के बाद अत्यन्त मधुरवाणी से उस कच ने वृहस्पति से पुनः पूछा । कच ने कहा : हे तात, मैंने जो सर्वत्याग किया है, उसका आज यद्यपि आठवाँ वर्ष है, तथापि निर्मल शान्ति मैं प्राप्त नहीं कर रहा हूँ। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, अरण्य में उस तरह के दीन वचन कच बोल रहा ही था की "सभी का त्याग करो” यों कहकर वृहस्पति आकाश में अदृश्य हो गये । बृहस्पति के चले जाने के अनन्तर कच ने अपने शरीर पर से वल्कल आदि का भी परित्याग कर दिया ओर यह चन्द्र, बादल, तारे ओर सूर्य से रहित शरत्‌ काल के आकाश की (जब सूर्योदय काल समीप रहता है, तब के आकाश की) नाई दिगम्बर हो गया