Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, Verses 31–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, verses 31–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 31-35
संस्कृत श्लोक
बृहस्पतिरुवाच ।
अपि पुष्पावदलनादपि लोचनमीलनात् ।
सुकरोऽहंकृतेस्त्यागो न क्लेशोऽत्र मनागपि ॥ ३१ ॥
यथैतदेवं तनय तथा श्रृणु वदामि ते ।
अज्ञानमात्रसंसिद्धं वस्तु ज्ञानेन नश्यति ॥ ३२ ॥
वस्तुतो नास्त्यहंकारः पुत्र मिथ्याभ्रमो यथा ।
असन्सन्निव संपन्नो बालवेतालवत्स्थितः ॥ ३३ ॥
यथा रज्ज्वां भुजंगत्वं मरावम्बुमतिर्यथा ।
मिथ्यावभासः स्फुरति तथा मिथ्याप्यहंकृतिः ॥ ३४ ॥
असदेव यथा द्वित्वं मोहादिन्दौ विलोक्यते ।
तथा स्फुरत्यहंकारो न सत्यो वाप्यसन्न च ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
सत्य है, जब तक उसके साक्षी का परिचय नहीं हो जाता, तब तक उसका परित्याग करना असम्भव
है, परन्तु जब साक्षी का परिचय हो जाता है, तब उसका त्याग कर सकते हैं, इस आशय से कहते हैं।
बृहस्पति ने कहा : हे पुत्र, अहंकाररूप चित्त का त्याग तो फूलों के मर्दन से भी और नेत्रों के
मीलन से भी अत्यन्त सुलभ है, अतः इसके त्याग में तनिक भी क्लेश नहीं है । हे तनय, इसका त्याग
जिस उपाय से सुलभ होता है, उस उपाय को कहता हूँ, सुनो । जो वस्तु केवल अज्ञान से उत्पन्न
होती है, उसका ज्ञान से विनाश हो जाता है, यह अहंकार शुद्ध साक्षी के अपरिचयरूप मोह से
उत्पन्न हुआ है, अतः साक्षी का परिचय हो जाने पर नष्ट हो जायेगा । हे पुत्र, जैसे मिथ्या भ्रम कुछ
वस्तु नहीं है, वैसे ही अहंकार भी वास्तव में कुछ है ही नहीं । अज्ञानियों की दृष्टि से यह उस प्रकार
असत् होता हुआ उत्पन्न हुआ है, जिस प्रकार बालक की दृष्टि से असत् वेताल उत्पन्न होता हे ।
जैसे डोरी में अज्ञान से साँप मिथ्या भासता है अथवा जैसे शुष्क मरुभूमि में अज्ञान से मिथ्या पानी
का ज्ञान होता हे, वैसे ही अज्ञान से अहंकार भी मिथ्या ही भासता है । जैसे चन्द्रमा एक ही है, परन्तु
उसमें मोह से असत्य द्वित्व दिखाई देता है, वेसे ही यह अहंकार मोह से ही दिखाई देता हे । वह न
तो सत्य है, न असत्य ही है ओर न सत्य-असत्य ही हे