Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, Verses 24–29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, verses 24–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 24-29
संस्कृत श्लोक
पदार्थवृन्दं देहादि न चित्तमिति कथ्यते ।
तदेतत्किं क्व वा व्यर्थं निरागस्कं त्यजाम्यहम् ॥ २४ ॥
पितुः सकाशं गच्छामि ज्ञातुं चित्तं महारिपुम् ।
ज्ञात्वा तत्संत्यजाम्याशु ततस्तिष्ठामि विज्वरः ॥ २५ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति संचिन्त्य स कच उज्जगाम त्रिविष्टपम् ।
वाक्पतिं प्राप्य सस्नेहं ववन्दे प्रणनाम च ॥ २६ ॥
अपृच्छच्चैनमेकान्ते किं चित्तं भगवन्वद ।
स्वरूपं ब्रूहि चित्तस्य येन तत्संत्यजाम्यहम् ॥ २७ ॥
बृहस्पतिरुवाच ।
चित्तं निजमहंकारं विदुश्चित्तविदो जनाः ।
अन्तर्योऽयमहंभावो जन्तोस्तच्चित्तमुच्यते ॥ २८ ॥
कच उवाच ।
त्रयस्त्रिंशन्महाकोटिप्रमाणस्य महामते ।
गुरो गीर्वाणवृन्दस्य कथमेतद्वदेति मे ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
त्रिपुर का दाह करने पर जैसे अघुररो का स्वयं दाह हो गया, उस तरह देह, इन्द्रिय आदि का त्याग
करने पर चित्त का स्वयं त्याग हो जायेगा, इस पर कहते हैं।
देह आदि जो कुछ ये प्रसिद्ध पदार्थ हैं, वे तो चित्त नहीं कहे जा सकते और उनमें चित्त कहाँ रहता
है, इसका भी निरूपण नहीं हो सकता, इसलिए बेचारे अपराधशून्य देह आदि का मैं व्यर्थ क्यों त्याग
करूँ ? इस परिस्थिति में अब चित्तस्वरूप महाशत्रु को जानने के लिए पिताजी के पास ही जाता हूँ।
जानकर मैं उसका त्याग करूँगा । तदनन्तर जल्द ही समस्त शोकों से निर्मुक्त हो जाऊँगा। महाराज
वसिष्ठजी ने कहा : रघुवर, ऐसा विचार कर वह कच स्वर्ग में चला गया तथा बृहस्पति के पास जाकर
स्नेहपूर्वक वन्दना और प्रणाम किया । एकान्त में उसने उनसे पूछा : हे भगवन्, चित्त क्या है, इसका
आप मुझे उपदेश दीजिए और चित्त का स्वरूप भी बतलाइये, जिससे कि मैं उसका त्याग करूँ।
बृहस्पति ने कहा : आयुष्मन्, चित्ततत्त्वज्ञ महानुभाव अपने अहंकार को ही चित्त जानते हैं, अतः जन्तु
का जो यह भीतरी अहम्भाव है, वही चित्त कहा जाता है। कच ने कहा : हे तैंतीस करोड़ देवताओं के
गुरो, हे महामते, अहम्भाव ही चित्तरूप कैसे हो सकता है, उसे मुझसे कहिए, क्योंकि लोक में अहंकार
की आत्मा के रूप में प्रसिद्धि है, यदि उसका त्याग कर देंगे, तो शून्यता ही हो जायेगी