Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 100
17 verse-groups
- Verses 1–2निनानबेर्वौँ सर्गे समाप्त सोवाँ सर्ग ब्रह्म सत्ता से ब्रह्म के सदृश जगत् की पृथक सत्ता क…
- Verse 3हो ही नहीं सकती
- Verse 4अजन्मा होने से इसमें साद्श्यप्रसक्ति अवश्य होगी, यह कहते है । जो कार्य कारण से उत्पन्न हो…
- Verse 5उत्पन्न क्यो नहीं होता, इस पर कहते हैं। हे राजन्, भला आप बतलाइये तो सही, जिसका कोई बीज ह…
- Verse 6उसमें बीजादि हेतुओं का अभाव कैसे है, यदि ऐसी शंका हो, तो इसका उत्तर यह है कि प्रमाण से सि…
- Verse 7चूँकि कर्ता, कर्म और कारणशून्य परमशिव में कारणता नहीं है, इसलिए जगत् शब्दार्थज्ञान का वह…
- Verse 8अतएव हे राजन्, शुद्ध आकाशसदृश, सदात्मक निर्विशेष जो ब्रह्मवस्तु स्थित है उसीको आप अपने ह…
- Verse 9चिन्मात्ररूप प्रमा से ही यह जगत् ब्रह्मरूप बन जाता है और अतत्त्वाकार मन की भ्रान्ति से ब…
- Verse 10हे पृथिवीपते, चित्त का जो अन्यथाभाव है वही ब्रह्मस्वरूपहानि कही गयी हे, जो पण्डितो से स्व…
- Verse 11उसीको स्पष्ट वतलाते है। हे नृप, नाशस्वभाव उस चित्त को नाशात्मक जानिये, क्योकि क्षणभर के ल…
- Verse 12असंकल्प द्वारा पर्यवसित तत्वज्ञान से वह चित्त नष्ट हो जाता है, यह कहते है। सम्यग् ज्ञानो…
- Verse 13ठीक है, संकल्प का नाश हो जाय, फिर भी विश्व की निवृत्ति कैसे होगी, यदि ऐसी आशंका की जाय, त…
- Verses 14–15इसमें लोकवृत्त को प्रमाणरूप से उपस्थित करते हैं । हे राजन्, दोनों हाथ उठाकर जो ऊँचे स्वर…
- Verse 16तव चित्त आदि हैं, इस अनुभव की क्या दशा होगी, यदि ऐसी आशंका हो, तो उसका उत्तर यह है कि वह…
- Verses 17–18ठीक है, तब तो भ्रान्ति के एक बहुत बड़े पुंजरूप उसे सत् ही मान लीजिये । नहीं, ऐसा कहते है…
- Verses 19–28तब अज्ञानरूप से ही चित्तादि को सत्य कहा जाय, इस पर कहते हैं। संवेदनरूप ज्ञान से अज्ञान मे…
- Verses 29–35तब जीवन्मुक्त लोग घटादि-आकार किसको देखते है, इस पर कहते है । घटादि के आकाररूप से एक वह आत…