Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
शिखिध्वज उवाच ।
एवं चेत्तन्महाबुद्धे यादृशं कारणं परम् ।
कार्यं तादृशमेवेदं जगदित्येव वेद्म्यहम् ॥ १ ॥
कुम्भ उवाच ।
यत्र कारणता तस्य कार्यं तदुपपद्यते ।
यन्न कारणमेवादौ तस्मात्कार्यं कुतो भवेत् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
निनानबेर्वौँ सर्गे समाप्त
सोवाँ सर्ग
ब्रह्म सत्ता से ब्रह्म के सदृश जगत् की पृथक सत्ता का निषेध
तथा जन्म आदि विकारों से रहित ब्रह्म की स्वतः सत्ता का विधान ।
यदि ब्रह्म ओर जगत् इन दोनों की एक ही सत्ता है तब उसी सत्ता से ब्रह्म की नाई जगत् भी परमार्थ
सत्य क्यो नहीं होगा, मिथ्या वस्तु के कारण का तो निरूपण अत्यन्त कठिन है, परन्तु सत्य वस्तु का
तुल्यस्वरूप होने के कारण ब्रह्म कारण हो सकता है, यों राजा शिखिध्वज आशंका करते है ।
राजा शिखिध्वज ने कहा : हे महाबुद्धे, यदि एेसी वात है तो जिस तरह परब्रह्मरूप कारण सत्य है
वैसे ही यह जगत् कार्य भी सत्य है, यह मैं जानता हू । कुम्भ ने कहा : हे राजन्, जिसमें कारणता है
उसका वैसा कार्य हो सकता हे परन्तु जो निर्गुण ब्रह्म है वह तो पहले से ही कारण नहीं हे, फिर उससे
कार्य होगा ही कैसे ?