Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मैव त्वं स्वरूपं सद्यत्स्थितं धारयस्व तत् ।
असम्यग्दर्शिविषयं तदेव जगदाचितम् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव हे राजन्, शुद्ध
आकाशसदृश, सदात्मक निर्विशेष जो ब्रह्मवस्तु स्थित है उसीको आप अपने हृदय में “मैं वही शुद्ध ब्रह्म
हूँ यों तत्त्वदृष्टि से धारण कीजिये । वही असम्यग् दर्शियों का विषय असीम जगत् है