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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verses 19–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, verses 19–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 19-28

संस्कृत श्लोक

अज्ञानसत्त्वसंवित्तेर्ज्ञानात्संवेदनात्क्षयः । जलज्ञानं मुधा भ्रान्तिः साधो मरुमरीचिषु ॥ १९ ॥ नैतज्जलमिति ज्ञानात्संवित्तेः प्रविलीयते । इदं चित्तमिति प्रौढं यदज्ञानमलं हृदि ॥ २० ॥ नास्ति चित्तमिति ज्ञानात्तत्समूलं विनश्यति । यथा रज्ज्वां भुजङ्गत्वमज्ञानभ्रमसंभवम् ॥ २१ ॥ न सर्पोऽयमिति ज्ञानाद्हृदि रूढात्प्रणश्यति । तथात्मनि मनोभूतमज्ञानभ्रमसंभवम् ॥ २२ ॥ चित्तं नास्तीति विज्ञानाद्हृदि रूढाद्विनश्यति । चित्तं मनोऽहमित्यन्तर्यावदज्ञानसंभवम् ॥ २३ ॥ न चित्तमस्ति नो चैवमहंकारादिसंयुतम् । किंचिदेव जगत्यस्मिन्संविदेकान्तनिर्मला ॥ २४ ॥ तया संकल्पचित्तादि कृतमासीद्विमूढया । अद्यासंकल्पतः सर्वं परित्यक्तं प्रबुद्धया ॥ २५ ॥ संकल्पेन यदा याति त्वसंकल्पेन गच्छति । पवनेन महाबाहो ज्वालाजालमिवानले ॥ २६ ॥ आत्मतत्त्वैकघनया ततया ब्रह्मसत्तया । जगत्सर्वमिति व्याप्तं समुद्र इव वारिणा ॥ २७ ॥ नाहमस्मि न चान्योस्ति न त्वं नैते न चित्तकम् । नेन्द्रियाणि न चाकाशमात्मा त्वेकोऽस्ति निर्मलः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

तब अज्ञानरूप से ही चित्तादि को सत्य कहा जाय, इस पर कहते हैं। संवेदनरूप ज्ञान से अज्ञान मेँ सत्त्वबुद्धि का नाश हो जाता है, हे साधो, मरुमरीचिका में जलज्ञान व्यर्थ भ्रान्ति ही हे । जैसे मरुमरीचिका में हुआ जलज्ञान “यह जल नहीं हे", इस ज्ञान से नष्ट हो जाता है वैसे ही "यह चित्त है” इस रूप से हृदय में हुआ संवित्‌ का जो प्रौढ अज्ञानात्मक मल है वह "यह चित्त नहीं है” इस ज्ञान से समूल विनष्ट हो जाता ह । जैसे अज्ञानभ्रम से उत्पन्न हुई रज्जु में सर्परूपता “यह सर्प नहीं है” इस तरह के हृदय में आरूढ ज्ञान से नष्ट हो जाती है, वैसे ही आत्मा में अज्ञानभ्रम से उत्पन्न हुआ मनोरूप चित्त यह चित्त नहीं है” इस तरह के हृदय में आरूढ विज्ञान से विनष्ट हो जाता है । चित्त, मन, अहंकार आदि सकल पदार्थ हृदय में अज्ञान से उत्पन्न हुए हैँ । वस्तुतः इस जगत्‌ में चित्त नहीं है और इसी तरह अहंकारादि से संयुक्त देहादि कुछ भी नहीं है, किन्तु एकान्त निर्मल एक संवित्‌ ही हे । विमूढ उस संवित्‌ के द्वारा ही संकल्प, चित्त आदि की रचना की गई थी । आज प्रबुद्ध हुई संवित्‌ ने संकल्प के अभाव से उन सबका परित्याग कर दिया । हे महाबाहो, जैसे पवन से अग्नि में ज्वालाजाल ऊपर उठता है ओर उसके अभाव से फिर नष्ट हो जाता हे वैसे ही संकल्प से जो पदार्थ आता है वह संकल्प के अभाव से चला जाता है । जैसे जल से समुद्र ग्रस्त है वैसे ही आत्मतत्त्व से अत्यन्त घनीभूत विस्तृत ब्रह्मसत्ता से यह सारा संसार व्याप्त (ग्रस्त) है । मैं नहीं हूँ, अन्य नहीं है, न आप हैं, न ये सब पदार्थ हैं, न चित्त है, न इन्द्रियाँ हैं और न आकाश ही है। केवल एक निर्मल आत्मा ही है