Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verses 29–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, verses 29–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 29-35
संस्कृत श्लोक
घटाद्याकाररूपेण स एवायं विलोक्यते ।
इदं चित्तमयं चाहमिति कैव कुकल्पना ॥ २९ ॥
न जायते न म्रियते किंचिदस्मिञ्जगत्त्रये ।
केवलोऽयं चिदुल्लासः सदसद्भावनात्मना ॥ ३० ॥
सर्वमात्मा परंब्रह्म सकृत्प्रकटमाततम् ।
द्वित्वैकत्वे न विद्येते न भ्रान्तिर्न च संभ्रमः ॥ ३१ ॥
सर्वेन्द्रियगणाकारे सन्नेवासि सखे ततः ।
न दह्यसे महाबुद्धे न च क्वचन लिप्यसे ॥ ३२ ॥
न ते विनश्यति सखे न च किंचिद्विवर्धते ।
निर्मलाकाशरूपस्य कैवल्यानन्तरूपिणः ॥ ३३ ॥
इच्छानिच्छात्मिके शक्ती येतरापि त्वमेव च ।
न ह्यंशुव्यतिरेकेण शशाङ्क उपलभ्यते ॥ ३४ ॥
अजमजरमनाद्यजस्वभावं सकृदमलं विलसत्सदैकरूपम् ।
विगलितकलनं कलाख्यलीलं सदुदितमाद्यमजं तदात्मतत्त्वम् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब जीवन्मुक्त लोग घटादि-आकार किसको देखते है, इस पर कहते है ।
घटादि के आकाररूप से एक वह आत्मा ही जीवन्मुक्तो को दिखाई देता हे । यह चित्त है, यह मैं हूँ,
इत्यादि कुकल्पना उन्हें कैसी ? हे महीपते, इस त्रैलोक्य में कोई जन्म लेता है ओर न कोई मरता ही
है। सत् ओर असत् भावनारूप यह केवल चिति का उल्लासमात्र हे । यह सर्वात्मक व्यापकं ब्रह्म परमात्मा
ही जब एक वार प्रकट हुआ, तब द्वित्व ओर एकत्व रहता ही नहीं । भ्रम तथा मृत्यु आदि का भय भी नहीं
रहता । इसलिए हे मित्र, आप सम्पूर्ण इन्द्रियो मेँ तथा इन्द्रियों से ग्राह्य अग्नि आदि के आकारो में
सन्मात्रस्वरूप से व्याप्त हैं, अतः हे महाबुद्धे, आप दाह हेतु आध्यात्मिकादि भावों से दग्ध नहीं हो
सकते ओर न आप कहीं लिप्त ही हो सकते हैँ । हे मित्र, निर्मल आकाशस्वरूप तथा कैवल्यानन्तरूप
आपका न तो कुछ विनष्ट हो सकता है ओर न कुछ बढ़ ही सकता हे । इच्छा ओर अनिच्छा स्वरूप
शक्त्यो तथा क्रियाशक्ति भी आप ही हैं, क्योकि हे मित्र, अपनी कलाओं से पृथक् चन्द्रमा उपलब्ध
नहीं होता । हे महीपते, अजन्मा, अजर, अनादि अजस्वभाव (४) निर्मल, सदा एकरूप, सकृत्
प्रकाशस्वरूप, कलनारहित, अपने स्वरूप का परिचय करानेवाली लीला से युक्त, सन्मात्र से उदित,
सम्पूर्ण व्यवहारो से पूर्व सिद्ध जो अज वस्तु है वही आत्मतत्त्व है