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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verses 14–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

हस्तावुत्क्षिप्य यो ब्रूते शद्रोऽस्मीति भृशं गिरा । कथं स विप्रो भवति विप्रत्वं त्वस्य कीदृशम् ॥ १४ ॥ विवृत्तधातुरत्युच्चैर्मृतोऽस्मीति विरौति यः । मृतिमेवागतं विद्धि जीवनं तस्य संभ्रम ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

इसमें लोकवृत्त को प्रमाणरूप से उपस्थित करते हैं । हे राजन्‌, दोनों हाथ उठाकर जो ऊँचे स्वर से बार-बार यह कहता है कि मैं शूद्र हूँ, वह भला विप्र कैसे हो सकता है और उसका विप्रत्व हे केसा ? सन्निपात से कुपित धातुवाला जो मनुष्य बार-बार ऊँचे स्वर से चिल्लाता है कि मैं मर गया, मैं मर गया; हे राजन्‌, उसे आप जान लीजिये कि वह मृत्यु की गोद में सो गया है, उसका जीवन एक भ्रममात्र हे