Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
नाम्नैवाङ्गीकृताभावं यदि विश्वं हि कथ्यते ।
विद्यमानं कथं तत्स्यान्ननु तामरसेक्षण ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
ठीक है, संकल्प का नाश हो जाय, फिर भी विश्व की निवृत्ति कैसे होगी, यदि ऐसी आशंका की
जाय, तो उसका उत्तर यह है कि मिथ्या होने से ही। “विशति परमात्मन्येकीभवतिन
वस्त्वन्तरतयाऽवतिष्ठत इति विश्वम् (जो परमात्मा मे प्रविष्ट हो जाता है एकरूप से मिल जाता है,
न कि किसी दूसरी वस्तु के रूप से रहता है उसका नाम है - विश्व) ऐसे विश्वशब्द के निवर्चन को हृदय
में रखकर कहते हैं।
अपने अधिष्ठान ब्रह्म में प्रविष्ट होनेवाला, यह विश्वशब्द का अर्थ है - इसके अनुसार यदि अपने
नाम से ही अपना अभाव स्वीकार करनेवाला यह विश्व कहा जाता है, तो हे कमलनेत्र, (आप बतलाइये
तो सही) यह विद्यमान कैसे हो सकता है ?